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सोमवार, 22 दिसंबर 2014

काश.. ( केवल चार लाइन)



पेशावर में मासूमों के दिल दहशतगर्दों ने छलनी किये और इंसानियत को शर्मसार किया . एक मौन श्रधांजलि.


काश.. ( केवल चार लाइन)


 
वो जो गोलियां आतंकियों की चली थीं;

मासूमों का दिल छलनी कर गई थीं.,

काश कि इस सर्दी में जम जाती.

माओं की गोद सूनी तो न होने पाती .

                 वीणा सेठी

शनिवार, 23 मार्च 2013

.कविता .

अभी चलते रहना चाहता हूँ.....




एक कदम और आगे
आ गया हूँ मै.
पगडण्डी वही
दिशा वही है.
कारवां आगे बढ़ चला है;
मै भी उसके साथ
एक और कदम आगे
बढ़ा रहा हूँ.
मंजिल दूर सही;
पर
मै जनता हूँ
जो मजा
सफ़र में है;
वह
मंजिल तक पहुँचने में कहाँ.......!
अभी सफ़र जारी रहेगा;
ये है मुझे पता,
और
मै चलते रहना चाहता हूँ;
चलते चले जाना चाहता हूँ,
जिंदगी के
आखरी छोर तक.........

वीणा सेठी  

शनिवार, 9 मार्च 2013

कविता...

एक दिन नारी के नाम

8 मार्च का दिन
महिला दिवस घोषित है,
पर किसी ने
ये न सोचा
केवल एक दिन ही
नारी के नाम;
तो क्या
बाकि ३६४ दिन पर
केवल
पुरुष का अधिकार है.
सोचना अब ये है,
नारी के नाम
पूरे ३६५ दिन क्यों नहीं..?
आखिर
वह भी तो
फिर भी
इंसान है.
आधी दुनिया कि आबादी की
उससे ही तो पहचान है.
पर
कितना बड़ा
पाखंड है,
नारी “देवी” तो है,
मनाव कदापि नहीं हो सकती.
तभी तो देवी मान
केवल
एक दिन ही पूजी जा सकती.

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

कविता उस प्यारी लड़की के लिए जो अब नहीं है।



उसकी मुस्कान 




(उसकी मुस्कान )
कभी
शाम के धुंधलके सी;
कभी भोर के उजाले सी,
उसकी मुस्कान
छू जाती है
मेरे मन के कोने को.
कुछ पल
ठहर जाती है;
आँख के कोर पर,
दे जाती है
मेरे होठों को
एक मीठी सी मुस्कान.





(ये कविता उस प्यारी सी लड़की (दामिनी) को समर्पित है जो अपनी जान उन सोये हुए करोडो भारतीयों के लिए कुर्बान कर गई जो नारी को केवल एक चीज या सामान से अधिक कुछ नहीं समझते और उनका व्यवहार भी  वैसा ही सदियों से रहा है, हो सके तो ऐसे विचारधारा वाले अब तो शर्म करें और ऐसी वहशियाना और पाशविक कृत्य को करने से बाज आयें। जरुरत केवल अपनी सोच को बदलने की है नारी एक स्वतंत्र अस्तित्व और व्यक्तित्व है, उसका सम्मान और आदर करना सीखें ये जान ले  की वह पुरुषों के भोग क सामान नहीं इंसान है। 
आइये हम उस प्यारी सी लड़की की याद में ये संकल्प कि उसकी कुरबानी को जाया नहीं जाने देंगे और जो आन्दोलन उसके इन्साफ के लिए उठा है वह जारी रहना चाहिए जबतक कि दामिनी को इन्साफ न मिल जाए और ऐसा फिर किसी भी नारी के साथ न हो )
 
 

बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

कविता-.......................13

रोटी:एक यक्ष प्रश्न  

एक ख्वाब देखा था
         रोटी का.
दुनिया ने जब
आँखें खोलने का मौका दिया;
तब
सुलगता सा प्रश्न देखा
          रोटी का.
समाज के वर्गों सा
मैंने;
आकर बदलता देखा
         रोटी का.
अमीर की डायनिंग टेबल पर
सोने की थाली में सजी रोटी;
पर
गरीब के
हाथ में है प्रश्न बिलखता
             रोटी का.
शामिल हुआ जब मै
दौड़ में जिंदगी की;
तब
सुरसा सा
सामने आया प्रश्न कमाना
             रोटी का.
स्वप्न सब हवा हुए
चक्रवात में रोटी के,
कोलतार की गर्म सड़क पर;
स्वयं को घसीटता
अब
मै स्वयं सुलग रहा हूँ,
तवे की झुलसी हुई रोटी सा.  




वीणा सेठी.

बुधवार, 15 अगस्त 2012

कविता ....आजादी की इस पावन बेला पर आज का भारत

सिमटते दायरे

मजहब और कौम के दायरे में
हम सिमट गए;
इन्सान की इंसानियत से
हम भटक गए.
जो गलियां-ओ-कूँचे रौशन थे
 गुल्जारों  से;
वो  इन्सान की दरिंदगी  से
वीरान हो गए.
जो कहते थे;
बहिश्त जमीं पे लायेंगे,
वो गैरों के टुकड़ों पे
नीलाम हो गए.
जो फूल खिले थे;
बहारों के साए तले,
वो खिजां में मुरझा के
दम तोड़ गए.
जो ख्वाब पाले थे
मासूमों की आँखों में;
वो आज दरिंदों के पैरों तले 
कुचल गए.
जो अरमान मचले थे
किन्ही नूरानी आँखों में;
वो मजहब की कातिल दीवारों में
चिन गए.
जिंदगी के ख्वाब और अरमान
जब दफ्न हो गए;
सोचा:
क्या करे जीकर कोई...?
पर
जब हम ढूंढने निकले
तो
मौत के दाम मंहगे हो गए.


वीणा सेठी  

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

kavita.....11

मुझे इल्जाम मत देना

मै इक आवाज हूँ 

मै
इक आवाज हूँ.
जब किसी मजलूम के
मुँह से निकलूँ, 
मुझे इल्जाम मत देना.
मै...
जब किसी की
सिसकी बन
आँखों से छलकूँ
मुझे इल्जाम मत देना.
मै...
जब किसी के
दर्द में
कराह बन जाऊं,
मुझे इल्जाम मत देना.
मै...
जब किसी के
दिल से
आह बन टपकूँ,
मुझे इल्जाम मत देना.
मै...
जब किसी के
चहरे पर
ख़ुशी बन चमकूँ,
मुझे इल्जाम मत देना.
मै..................

वीणा सेठी  

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

kavita.............10





सरहदों के साए




लहू से सींच रहे सरहदों के साए;
बारूद में पनप रहे दुनिया के सरमाये.
हर तरफ चल रही बारूद की हवाएं;
गोलियों से छलनी हो रहे
          इंसानों के सीने;
हर तरफ दरिंदगी में पनप के                                         
       लोग लगे हैं जीने.
हर तरफ बरस रहे बमों के गोले;
हर जिस्म पर पड़ रहे दहशत
       के फफोले;
हर मुल्क दुनिया का सरमाया बन रहा;
नफरत की आड़ में ख़ूनी खेल रहा;
हर शख्स है हैरान-पशेमाँ;
इंसानियत दम तोड़ रही कहाँ ??
इन्सान इन्सान को भूल रहा;
सिर्फ पाने लिए लड़ रहा,
ये दुनिया है इन्सान की
पर इन्सान है कहाँ??
इस सवाल से है हर शख्स है परेशान.
                                                              वीणा


                                                                

बुधवार, 13 जून 2012

कविता .............8

  खोया पाया............??




इन ६५ सालों में;
आइये देखें

हमने


क्या खोया.............?
क्या पाया...............?
जब पहुंचे


खोया-पाया वि
भाग में;

तो भ्रष्टाचार पाया:
ईमानदारी को खोया पाया.

झूठ पाया गया: सच को खोया पाया.

     
 नेताजी को कुर्सी पर पाया:और आम आदमी को खोया पाया.

लोकतंत्र का ढांचा पाया: लोकतंत्र को खोया पाया.








रविवार, 8 अप्रैल 2012

कविता..4

ये हमारी फितरत  नहीं .........




आँधियों से डर जाएँ;
ऐसी तो हमारी फितरत नहीं.
हम खामोश है तो;
कोई कमजोर नहीं.
दिखा सकते हैं ;
अपने बाजुओं का जोर.
तूफानों से कह दो;
करें रुख हमारी तरफ;
हम डटे हैं और रहेंगे;
सांस की आखरी हुँकार तक.

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

कविता---3 (Valentine Day)


                                                               तुम और मैं
तुम स्निग्ध धारा सी बहो;
मैं निर्मल जल हो जाऊँगा।


तुम धरा का रूप धरो;
मैं आकाश बन छाऊंगा।


तुम वर्षा सी उमड़ पड़ो;
मैं बादल बन जाऊंगा।


तुम दीप का रूप धरो;
मैं बाती बन जाऊंगा।


तुम लता सी लिपट पड़ो;
मैं वृक्ष बन जाऊँगा।



















शनिवार, 4 जून 2011

कविता..........2


आज ५ जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर मेरी ये कविता 
पर्यावरण हो हरा भरा.........



नदी सागर

मेघ बन


उड़ जाता आकाश में;



ज्योहीं देखा ' वन '


बरस पड़ा उल्लास में.



टप टप बूंदे टपकी;


बदल गए खेत-खलिहान


हरियाले लिबास में.



देखो थिरकती है धरती


खुशियों की उजास में.



पर्यावरण हो हर-भरा.


रहे हम ऐसे प्रयास में.

save the environment, save the forest- the natural forest, stop deforestation. that is must to check the green house effects and to save the earth.

रविवार, 27 फ़रवरी 2011

कविता.(वक्त कैसा है...??)

वक्त कैसा है...??



मैंने कभी छू कर देखा ही नहीं
वक्त
कैसा है...........??


शायद
मेरे
आँगन के गमले में लगे
मनी
प्लांट जैसा है.........


फिर शायद
भोर में चमकती पत्ते पर पड़ी
ओस
की बूंद जैसा है.......


या फिर
वृक्ष
से झड़ते सूखे पत्ते की
सिकुड़न
जैसा है ....


या शायद
झरने
के गिरते पानी से बनती
झाग
जैसा है..........


या फिर
गर्म तवे पे पड़ी झनझनाती
पानी की बूंद जैसा है......



या शायद
किसी आँख के कोर पर ठहरी
आंसू की बूंद जैसा है.........


.
मैंने तो कभी.....................????

वीणा सेठी




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