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सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

कविता---3 (Valentine Day)


                                                               तुम और मैं
तुम स्निग्ध धारा सी बहो;
मैं निर्मल जल हो जाऊँगा


तुम धरा का रूप धरो;
मैं आकाश बन छाऊंगा


तुम वर्षा सी उमड़ पड़ो;
मैं बादल बन जाऊंगा


तुम दीप का रूप धरो;
मैं बाती बन जाऊंगा


तुम लता सी लिपट पड़ो;
मैं वृक्ष बन जाऊँगा



















रविवार, 27 फ़रवरी 2011

कविता.(वक्त कैसा है...??)

वक्त कैसा है...??



मैंने कभी छू कर देखा ही नहीं
वक्त
कैसा है...........??


शायद
मेरे
आँगन के गमले में लगे
मनी
प्लांट जैसा है.........


फिर शायद
भोर में चमकती पत्ते पर पड़ी
ओस
की बूंद जैसा है.......


या फिर
वृक्ष
से झड़ते सूखे पत्ते की
सिकुड़न
जैसा है ....


या शायद
झरने
के गिरते पानी से बनती
झाग
जैसा है..........


या फिर
गर्म तवे पे पड़ी झनझनाती
पानी की बूंद जैसा है......



या शायद
किसी आँख के कोर पर ठहरी
आंसू की बूंद जैसा है.........


.
मैंने तो कभी.....................????

वीणा सेठी




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