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सोमवार, 31 दिसंबर 2012

कविता उस प्यारी लड़की के लिए जो अब नहीं है।



उसकी मुस्कान 




(उसकी मुस्कान )
कभी
शाम के धुंधलके सी;
कभी भोर के उजाले सी,
उसकी मुस्कान
छू जाती है
मेरे मन के कोने को.
कुछ पल
ठहर जाती है;
आँख के कोर पर,
दे जाती है
मेरे होठों को
एक मीठी सी मुस्कान.





(ये कविता उस प्यारी सी लड़की (दामिनी) को समर्पित है जो अपनी जान उन सोये हुए करोडो भारतीयों के लिए कुर्बान कर गई जो नारी को केवल एक चीज या सामान से अधिक कुछ नहीं समझते और उनका व्यवहार भी  वैसा ही सदियों से रहा है, हो सके तो ऐसे विचारधारा वाले अब तो शर्म करें और ऐसी वहशियाना और पाशविक कृत्य को करने से बाज आयें। जरुरत केवल अपनी सोच को बदलने की है नारी एक स्वतंत्र अस्तित्व और व्यक्तित्व है, उसका सम्मान और आदर करना सीखें ये जान ले  की वह पुरुषों के भोग क सामान नहीं इंसान है। 
आइये हम उस प्यारी सी लड़की की याद में ये संकल्प कि उसकी कुरबानी को जाया नहीं जाने देंगे और जो आन्दोलन उसके इन्साफ के लिए उठा है वह जारी रहना चाहिए जबतक कि दामिनी को इन्साफ न मिल जाए और ऐसा फिर किसी भी नारी के साथ न हो )
 
 

रविवार, 21 मार्च 2010

लघु कथा -1...........(बचपन)

हाथ में रोटी का टुकड़ा ........
शहर के चोराहे के पास कचरे का ढ़ेर पड़ा थाउसी ढ़ेर पर बसी खाने का सामान भी बिखरा था, - गरीब बच्चे और बूढ़े खाने के सामान पर अपना हाथ साफ कर रहे थे , बासी खाने में से अपने खाने लायक खाना ढूंढते हुए एक बच्चा ख़ुशी से चिल्लाया, वाह ! मुझको तो बर्फी मिली और उसके हाथ में बर्फी का टुकड़ा थाउसे देख दूसरे बच्चे भी इसी उम्मीद में कचरे के ढ़ेर में पड़े बासी खाने को तेजी से खंगालने लगेतभी पुलिस की सिटी की आवाज से सभी भिखारी घबरा गए और वहाँ से भाग छूटे. वो सड़क एक भीड़ भरी जगह थी और वाहने की आवाजाही की भरमार थीऐसे में बाकि सबने तो दौड़ कर सड़क पर कर ली पर एक छोटा गरीब बच्चा उनसे पीछे रह गया और सड़क पर करने की चेष्टा में एक बस की चपेट में गयाचारो और अफरा-तफरी मच गई बच्चे ने बस की नीचे दम तोड़ दिया था किन्तु उसके उस हाथ में अभी भी जीवन के चिन्ह थे जिसमे रोटी का टुकड़ा था और धीरे से वो हाथ भी अब कापकर शांत हो चुका था थोड़ी देर बाद उस चोराहे पर वैसे ही वाहनों की आवाजाही शुरू हो गई थी और लग ही नहीं रहा था की अभी कुछ पल पहले यहाँ किसी बचपन ने दम तोडा था.




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