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शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

क्षणिकाएँ..................2

जीवन-मृत्यु


चित्र -सौजन्य google.com
1
पेड़ पे ऊगी कोंपल;
बन हरा पत्ता,
फिर मुरझाया;
डाल से टूट गया.

2
मुठ्ठी में भरी रेत;
धीरे से फिसली
और मुठ्ठी रीत गई.

3
खेत में लहलहाई 
फसल;
पककर कटी,
खेत खाली कर गई.

4
पानी का बुलबुला;
धीरे से उठ,
सतह पर आया;
फिर विलीन हो गया.

5
भोर में;
आसमां से पत्ते पर गिरी
ओस की बूंद,
सूरज के सर चढ़ते ही,
हवा हो गई.
वीणा सेठी




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सोमवार, 31 दिसंबर 2012

कविता उस प्यारी लड़की के लिए जो अब नहीं है।



उसकी मुस्कान 




(उसकी मुस्कान )
कभी
शाम के धुंधलके सी;
कभी भोर के उजाले सी,
उसकी मुस्कान
छू जाती है
मेरे मन के कोने को.
कुछ पल
ठहर जाती है;
आँख के कोर पर,
दे जाती है
मेरे होठों को
एक मीठी सी मुस्कान.





(ये कविता उस प्यारी सी लड़की (दामिनी) को समर्पित है जो अपनी जान उन सोये हुए करोडो भारतीयों के लिए कुर्बान कर गई जो नारी को केवल एक चीज या सामान से अधिक कुछ नहीं समझते और उनका व्यवहार भी  वैसा ही सदियों से रहा है, हो सके तो ऐसे विचारधारा वाले अब तो शर्म करें और ऐसी वहशियाना और पाशविक कृत्य को करने से बाज आयें। जरुरत केवल अपनी सोच को बदलने की है नारी एक स्वतंत्र अस्तित्व और व्यक्तित्व है, उसका सम्मान और आदर करना सीखें ये जान ले  की वह पुरुषों के भोग क सामान नहीं इंसान है। 
आइये हम उस प्यारी सी लड़की की याद में ये संकल्प कि उसकी कुरबानी को जाया नहीं जाने देंगे और जो आन्दोलन उसके इन्साफ के लिए उठा है वह जारी रहना चाहिए जबतक कि दामिनी को इन्साफ न मिल जाए और ऐसा फिर किसी भी नारी के साथ न हो )
 
 

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