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शनिवार, 2 जुलाई 2011

यादें---3....................( जलती चिता -जीवन के पहलू...)..1..

जलती चिता का अलाव .......................???


जनवरी की सर्द दोपहरी में बस का सफ़र करते समय बाहर की द्र्श्यावली का आनंद ले रही थीभोपाल के रास्ते में एक छोटा क़स्बा अब्दुल्ला गंज से जब बस होकर गुजर रही थी तो एक स्थान पर जो द्रश्य देखा वहां से मेरी निगाह हट नहीं पाईबस धीरे से उस जगह के सामने से निकल जाने के बाद भी मैंने अपनी निगाहें खिड़की से सटा कर पीछे मुड़ कर देखती रही, वो जगह उस कसबे का शमशान घाट था, जहाँ पर चिता जलने के - स्थान बने थे .

और एक चिता से अभी भी ऊँची लपते उठ रही थी पर आसपास कोई भी इन्सान नहीं था, थे तो कुछ मौन पशु जो उस चिता को घेरे खड़े थे और उसकी अंतिम यात्रा के मूक गवाह थेचिता के आसपास - गायें अविचल खड़ी थीजनवरी की ठण्ड में उन्हें भी जलती चिता से अलाव का काम लेने को विवश कर दिया थामरने वाले की काया अपने अस्तित्व के ख़त्म हो जाने के बाद भी किसी के काम रही थीलगता है देह की नश्वरता की आभास करने वालो को शायद मालूम नहीं की जीवन के नष्ट हो जाने के बाद भी देह की उपयोगिता कायम रहती है और यही सत्य है.




रविवार, 21 मार्च 2010

लघु कथा -1...........(बचपन)

हाथ में रोटी का टुकड़ा ........
शहर के चोराहे के पास कचरे का ढ़ेर पड़ा थाउसी ढ़ेर पर बसी खाने का सामान भी बिखरा था, - गरीब बच्चे और बूढ़े खाने के सामान पर अपना हाथ साफ कर रहे थे , बासी खाने में से अपने खाने लायक खाना ढूंढते हुए एक बच्चा ख़ुशी से चिल्लाया, वाह ! मुझको तो बर्फी मिली और उसके हाथ में बर्फी का टुकड़ा थाउसे देख दूसरे बच्चे भी इसी उम्मीद में कचरे के ढ़ेर में पड़े बासी खाने को तेजी से खंगालने लगेतभी पुलिस की सिटी की आवाज से सभी भिखारी घबरा गए और वहाँ से भाग छूटे. वो सड़क एक भीड़ भरी जगह थी और वाहने की आवाजाही की भरमार थीऐसे में बाकि सबने तो दौड़ कर सड़क पर कर ली पर एक छोटा गरीब बच्चा उनसे पीछे रह गया और सड़क पर करने की चेष्टा में एक बस की चपेट में गयाचारो और अफरा-तफरी मच गई बच्चे ने बस की नीचे दम तोड़ दिया था किन्तु उसके उस हाथ में अभी भी जीवन के चिन्ह थे जिसमे रोटी का टुकड़ा था और धीरे से वो हाथ भी अब कापकर शांत हो चुका था थोड़ी देर बाद उस चोराहे पर वैसे ही वाहनों की आवाजाही शुरू हो गई थी और लग ही नहीं रहा था की अभी कुछ पल पहले यहाँ किसी बचपन ने दम तोडा था.




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