जलती चिता का अलाव .......................???
जनवरी की सर्द दोपहरी में बस का सफ़र करते समय बाहर की द्र्श्यावली का आनंद ले रही थी। भोपाल के रास्ते में एक छोटा क़स्बा अब्दुल्ला गंज से जब बस होकर गुजर रही थी तो एक स्थान पर जो द्रश्य देखा वहां से मेरी निगाह हट नहीं पाई। बस धीरे से उस जगह के सामने से निकल जाने के बाद भी मैंने अपनी निगाहें खिड़की से सटा कर पीछे मुड़ कर देखती रही, वो जगह उस कसबे का शमशान घाट था, जहाँ पर चिता जलने के ५-७ स्थान बने थे .
और एक चिता से अभी भी ऊँची लपते उठ रही थी पर आसपास कोई भी इन्सान नहीं था, थे तो कुछ मौन पशु जो उस चिता को घेरे खड़े थे और उसकी अंतिम यात्रा के मूक गवाह थे। चिता के आसपास ३-४ गायें अविचल खड़ी थी। जनवरी की ठण्ड में उन्हें भी जलती चिता से अलाव का काम लेने को विवश कर दिया था। मरने वाले की काया अपने अस्तित्व के ख़त्म हो जाने के बाद भी किसी के काम आ रही थी। लगता है देह की नश्वरता की आभास करने वालो को शायद मालूम नहीं की जीवन के नष्ट हो जाने के बाद भी देह की उपयोगिता कायम रहती है और यही सत्य है.