जमीन और रोटी के ये हिंसात्मक लड़ाई .....
माओवादियों का हिंसात्मक दमन..............................
हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ और बिहार में माओवादियों द्वारा जिस तरह से हिंसात्मक कायवाही की गई है उसे कोई भी पसंद नहीं करेगा। पुलिस कर्मचारियों की हत्या, रेल की पटरियों को उड़ाना जैसी हिंसा से भरी गतिविधियाँ के कारण माओवादी आम आदमी की सहानुभूति भी खो देंगे।
ये बात सही है की भारत में इस तरह की माओवादी गतिविधियों से समस्या का हल नहीं निकलने वाला, इससे तो समस्या और भी गंभीर होगी।भारत में इस तरह की जो भी हलचलें हो रही हैं उसका सीधा असर गरीब तबके पर पड़ रहा है फिर वो बच्चों के स्कूल ही क्यों न हों.................... !?
भारत आज जिन समस्याओं से दो-चार हो रहा है उन सबका हमारे अतीत से सम्बन्ध है जब जातिगत सामाजिक ढाचें का निर्माण हुआ था- ये तब की तात्कालिक व्यवस्था थी जो की उस समय के अनुसार उचित थी पर कालांतर में ये इतनी रूढ़हो गई की इन्सान इन्सान में जातिगत भेदभाव के रूप में विकराल होती , और यह वैमनस्य आज नफरत का रूप ले चुका है और तो और अब तथाकाथित अमीर और राजनेताओं ने इन गरीबों और आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल करने की कोशिश शुरू कर दी है और जब रोजी-रोटी का प्रश्न जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है तो हथियार उठाना ही इन्हें अपनी समस्या का हल लगा। सरकार के खिलाफ हथियार उठा तो लिया पर उसका प्रभाव दूसरे लोगों पर दिखाई देने लगा है............................... वास्तव में माओवादियों का जमीन व रोजी-रोटी के लिए यह हिंसात्मक आन्दोलन किसी भी ठोस नतीजे की ओर नहीं जायेगा वरन ये आन्दोलन अपने उद्देश्य से ही भटक चुका है, हिंसा के खिलाफ सरकार की प्रतिहिंसात्मक कार्यवाही में बेगुनाहों का ही खून बहेगा और इसके साथ उन लोगों का भी मकसद हल होगा जो देश भारत में अस्थिरता चाहते हैं।
इस समस्या का हल हमारे ही पास है ................. पहले तो गरीब , आदिवासी और पिछड़े तबके के प्रति जो नफरत और कमतरी की हमारी सोच है उसे बदलना होगा . राजनेताओं और अफसरशाही की जो भ्रष्ट नीतियाँ इस देश को खोखला करने पर तुली हैं उन्हें बदलना बहुत जरुरी है नहीं तो ऐसे न जाने कितने माओवादी आन्दोलन पूरे देश में होने लगेंगे पता नहीं ...........................
