बात एक अनकही सी- उन बातों का एक सिलसिला है जो जाने अनजाने हमारे जीवन में रोजाना घटती रहती हैं और हम उनपर ध्यान देते भीहैं और उनकी अनदेखी भी कर देते हैं पर कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जो मन और दिमाग में बसेरा कर लेती हैं .ऐसी ही कुछ बातें और घटनाएँ बाटने की इच्छा है...............
मै इक आवाज हूँ. जब किसी मजलूम के मुँह से निकलूँ, मुझे इल्जाम मत देना. मै... जब किसी की सिसकी बन आँखों से छलकूँ मुझे इल्जाम मत देना. मै... जब किसी के दर्द में
कराह बन जाऊं, मुझे इल्जाम मत देना. मै... जब किसी के दिल से आह बन टपकूँ, मुझे इल्जाम मत देना. मै... जब किसी के चहरे पर ख़ुशी बन चमकूँ, मुझे इल्जाम मत देना. मै.................. वीणा सेठी
दिसम्बरकीठिठुरादेनेवालीरातमेंख़ामोशीकोचीरतीएकआवाजनेगहरीनींदसेजगादिया। रातमेंगश्तलगानेवालेचौकीदारकीआवाज " जागतेरहो..........." नेवाकईजगादियाथा । सारीरातइन्हीदोशब्दोंपरकेन्द्रितहोकररहगईथीपिछले२०००सालोंसेकोईनकोईचौकीदारइसीतरहसेआवाजलगाकरजगानेकीकोशिशकररहाहैऔर हमारी नींद है की टूटने का नाम नहीं ले रही। क्या वाकई हम जग चुके हैं...? उस ठिठुरती रात के अँधेरे में उस चौकीदार की आवाज फिर से सन्नाटे को चीरती हुई फिजा में गूंजने लगी ,'जागते रहो....."