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सोमवार, 21 दिसंबर 2015

नारी इंसान है पहचानो


नारी इंसान है सामान नहीं



“I’m writing this blog post to support Amnesty International’s #KnowYourRights campaign at BlogAdda.


एक समय  भारत में बनी एक फिल्म, नाम तो मुझे नहीं पता पर शायद 1950 या 60 के दशक में बनी का ये गाना बड़ा मशहूर हुआ था,...” औरत ने जन्म दिया मर्दों को; मर्दों ने उसे बाजार दिया...” और ये एक लाइन ही भारत जैसे देश में औरत की सामाजिक हैसियत या रुतबे की पोल खोलती है. तब भी औरत हाशिये पर खड़ी  थी और आज भी वही खड़ी है. हमारे समाज में नारी माँ के रूप में तो पूज्यनीय है पर नारी एक इंसान के रूप में कोई महत्त्व नहीं रखती. इसका साफ़-साफ़ कारण एक ही है जो उसे इंसान के रूप में स्थापित नहीं करता, और वो है नारी के प्रति पुरुष का नजरिया.  भारत क्या पूरी दुनिया में नारी को दोयम दर्जे का समझा जाता है और उसे पुरुष के साथ कदम से कदम मिलकर चलने की वास्तविक अर्थों में आजादी आज तक नहीं मिली, वह पुरुष की परछाईं की तरह पीछे चले तभी उसे सम्मान के लायक समझा जाता है.

 
नारी इंसान है पहचानो


वास्तव में नारी आज भी इंसान से ज्यादा सामान समझी जाती है. अब सामान केवल उपयोग में ही लाया जाता है और अनुपयोगी होने पर फेंक देने के अलावा उसका कुछ नहीं किया जा सकता. यदि ऐसे में नारी के साथ sexual violence होता है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं. नारी एक सामान से अधिक कुछ नहीं है तो जैसा कि उसे समझ और माना गया है- तो ऐसे में उसके साथ sexual violence हो रहा है और जिस तरह से graph ऊपर जा रहा है उससे वो अपने आप को अपने घर में भी महफूज नहीं पा रही है तो इसे रोकना अब जरुरी हो गया है. 


जैसा की सब जानते हैं पिछले 3-4 सालों से महिलाओं के साथ sexual violence के cases ज्यादा हो रहे हैं और उनकी ख़बरें भी प्रिंट और digital media में काफी coverage के साथ छपने और दिखाई जाने लगी हैं तो जरुरी हो जाता है कि ऐसी कोई भी खबर भेदभाव के छपी या दिखाई जाएँ. कुछ कारणों से ये अब बेहद जरुरी है कि ये news जरुर दिखाई या छपी जाये.

·     *    भारत में महिलाओं के प्रति होने वाले sexual violence के लिए लोगों में जागरूकता जागनी चाहिए और जगाई जानी चाहिए. जब तक लोगों के नारी के प्रति संवेदना नहीं जागेगी तब तक sexual violence की शर्मसार कर देने वाली घटनाएँ नहीं रुकेंगी. 

·        * बलात्कार के लिए पुरुष दोषी होता है और उसका खामियाजा अक्सर नहीं भुगतती है क्योंकि उसके लिए उसे ही दोषी माना जाता है और जब लोग ये जान लेते हैं तो उसकी जिंदगी को जहन्नुम बनाने में ये समाज देर नहीं लगाता. एक तो वह मानसिक और शारीरिक रूप से इस कदर घायल हो चुकी होती है कि उसे अपनी समस्या का हल आत्महत्या के रूप में ही नजर आता है. ये भारतीय समाज का वो शर्मनाक पहलू है जिसकी अब दुनिया को भी खबर होने लगी है. और भारतीय समाज अपने दोगलेपन को छुपाने के लिए अब अपनी अच्छी छवि बनाना चाहता है पर उसके इस दोगलेपन को उजागर करने के लिए जरुरी है कि इस तरह के sexual violence की reporting जरुर होना चाहिए. ताकि लोगों के सामने सच आये और लोगों की सोच भी उस पीड़ित के प्रति सहानुभूतिपूर्ण हो- जिससे वो फिर से एक सम्मान भरी जिंदगी की ओर लौट सके और सामान्य जीवन जी सके. 

·      *   नारी पहले एक इंसान है और उसे एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में समाज में स्थान मिलना चाहिए और ये तभी संभव है जब उसके प्रति सम्मान और संवेदना की भावना समाज में पनपे. ये तभी सम्भव है जब इस तरह के sexual violence की इंसानियत को शर्मसार करने वाले incident हों तब जो लोग बेहद casual सी reaction देते हैं, उन्हें रोका जाये और ऐसे लोंगों के खिलाफ बकायदा लामबंद होना जरुरी है. तभी लोग इस तरह के violence की intensity को समझ पाएंगे और उनकी संवेदना को झकझोरना बेहद आवश्यक है. ऐसे लोगों को ये समझ आना चाहिए कि जिस सतही ढंग से वे इस तरह की घटनाओं को ले रहे हैं उस तरह का शिकार उनका भी कोई अपना हो सकता है. जब तक लोगों के अंदर इस तरह की सोच नहीं जागेगी, हमारे देश में नारी का अपमान sexual violence की शर्मनाक घटनाओं के रूप में होता रहेगा.


अब वास्तव में समय आ गया है कि नारी के प्रति सदियों पुरानी  सोच को लोग बदलें और ये काम print और digital media के माध्यम से बेहतर ढंग से हो सकता है. क्या... आपको नहीं लगता मै शै कह रही हूँ.
केवल इतना ही मुझे कहना है.  (वीणा सेठी).

रविवार, 8 जून 2014

कविता



कविता:एक नई पहचान

मुस्कराहट
उसकी आँखों से उतरकर;
ओठों को दस्तक देती
कानों तक फ़ैल गई थी.
ये मुस्कराहट
उसकी सच्चाई की जीत
और
उपलब्धियों से आई थी.
वो थी:
एक लड़की
कदम-कदम पर
उसे ये बात;
याद कराई जाती थी.
बहुत बार
हताश-निराश हो,
वह
वापिस जाना चाहती थी;
पर हर बार
उसकी माँ की कही बात,
उसे याद आ जाती थी.
बेटी ...!
पहले अपने अंदर की
कमजोरी को जीतना,
याद रखना
तुम एक लड़की नहीं:
पहले एक इंसान हो.
आधी लड़ाई तो
तुम यही जीत जाओगी.
बाकि आधी:
जब लक्ष्य सामने नज़र आये,
अर्जुन बन
बस उसे बेध देना,
तब जीत जाओगी.
देखना तब:
समय और
तुम्हारे चारों ओर बहता,
सब कुछ थम जायेगा.
और
करतल ध्वनियों का कोलाहल
तुम्हारी सफलता को
और तुम्हे
एक नई पहचान दे जायेगा.

वीणा सेठी

शनिवार, 8 मार्च 2014

कविता:





महिला दिवस -8 मार्च 





एक नई पहचान

मुस्कराहट
उसकी आँखों से उतरकर;
ओठों को दस्तक देती
कानों तक फ़ैल गई थी.
ये मुस्कराहट
उसकी सच्चाई की जीत
और
उपलब्धियों से आई थी.
वो थी:
एक लड़की
कदम-कदम पर
उसे ये बात;
याद कराई जाती थी.
बहुत बार
हताश-निराश हो,
वह
वापिस जाना चाहती थी;
पर हर बार
उसकी माँ की कही बात,
उसे याद आ जाती थी.
बेटी ...!
पहले अपने अंदर की
कमजोरी को जीतना,
याद रखना
तुम एक लड़की नहीं:
"पहले एक इंसान हो".
आधी लड़ाई तो
तुम यही जीत जाओगी.
बाकि आधी:
जब लक्ष्य सामने नज़र आये,
अर्जुन बन
बस उसे बेध देना,
तब जीत जाओगी.
देखना तब:
समय और
तुम्हारे चारों ओर बहता,
सब कुछ थम जायेगा.
और
करतल ध्वनियों का कोलाहल
तुम्हारी सफलता को
और तुम्हे
एक नई पहचान दे जायेगा.
वीणा सेठी

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

आत्म विश्लेषण क्यों न करे एक बार..........

आत्म विश्लेषण क्यों न करे एक बार..........
कहते हैं की इन्सान दुनिया से मुँह चुरा सकता है पर स्वयं से नहींजब भी हम कुछ करते हैं अच्छा या बुरा हम स्वयं ही उसके गवाह और न्यायाधीश होते हैं, अगर अच्छा करते हैं तो खुद को शाबासी देते हैं और बुरा करते हैं तो स्वयं को कटघरे में खड़ा कर देते हैं,क्योंकि हम खुद के प्रति उत्तरदायी होते हैं पर ये सारी क्रिया हम दुनिया के सामने करने का साहस  कर सकते हैं … ??? नहीं … ना …!! क्योंकि हम दुनिया से मुँह चुरा रहे होते हैंहमारे  कार्य जीवन के प्रति हमारे नजरिये से जुड़े होते हैंहम क्या अच्छा करते हैं क्या बुरा करते हैं ये सब इसी नजरिये की  देन होता हैबुरा करने के बाद भी यदि हमें लगता है कि हमने सही किया है तो हम सही और गलत में फर्क कर पाने में असमर्थ होते हैं और यही से हम ढलान कि ओर सरकना शुरू हो जाते हैं जहाँ से सिर्फ और सिर्फ बुराई कि ओर चल पड़ते हैं और अपनी आत्मा कि आवाज की अनसुनी करने लगते हैं, क्योंकि हमारा मन या चेतना ,आत्मा इसे जो भी कहें हमारे अच्छे या बुरे कर्मों की साक्षी रहती हैवही हमें कटघरे में खड़ा कर सकती हैऔर वही जीवन के प्रति हमारे गलत नजरिये को सही कर सकती है.

बुराई को बड़ी सरलता से अपनाया जा सकता है और व्यक्ति बुराई की ओर जल्दी झुकता है क्योंकि बुराई हमेशा से इन्सान पर आसानी से हावी हो जाती है जबकि अच्छाई को अपनाने में कठिनाई आती है। अच्छाई में आत्मानुशासन की आवश्यकता होती है और अमूमन इन्सान  इसी बात से बचना चाहता है। अच्छाई का अगर रास्ता इतना ही आसान होता तो सारी  दुनिया में चारों ओर अच्छाई का ही बोलबाला होता, कहते हैं ना ,"बहुत कठिन है डगर पनघट की " , बिल्कुल अच्छाई के लिए यही बात सटीक बैठती  है।

 बुराई की सबसे  बुरी बात यही है कि वह इंसान को अपनी गिरफ्त में इस तरह से लेती है कि उसे सोचने का अवसर ही नहीं मिल पाता। बुराई वास्तव में एक मकड़जाल कि  मानिन्द है जिसमें एक बार उलझ गए तो निकल पाना पाना इतना सरल नहीं है। हाँ  …इससे  बाहर निकला जा सकता है, बशर्ते कि व्यक्ति जबतक स्वयं न चाहे। बुराई से बाहर निकलने के लिए हमारा विवेक और हिम्मत ही हमारा साथ दे सकते हैं। हौसला  और धीरज रखते यदि शान्त से   सोचेंगे तो हमें अपनी अपनाई हुई बुराई से बाहर निकलने का रास्ता मिल जायेगा।

जीवन के प्रति आशावादी और सकारात्मक सोच हमें बुराई कि तरफ जाने से रोकती है और अच्छाई का दामन थामे रखने में हमारी मदद करता करता है  … जरा थोड़ी देर के लिए एक बार रुकें  … और सोचें  … क्या वाकई आप किसी बुराई के शिकार तो नहीं  .... ?? अगर हैं तो कोई  बात नहीं आप उससे बाहर निकल सकते हैं  … बस  … एक कदम अच्छाई कि और बढ़ाएं तो सही  ....!!  

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