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शनिवार, 7 मार्च 2015

कुछ बाकि है


कुछ बाकि है … 

Image curtsy - Google.com
बातें तो बहुत सारी होती हैं कहने को पर कुछ बातें ऐसी होती हैं जो जेहन से नहीं निकलती, ऐसे ही एक बात है जो मैं सबसे शेयर करना चाहती हूँ.

मेरे जीवन में भी एक समय ऐसा आया  था जब लगा था मानो जिन्दगी ठहर गई हो और मैं एक ऐसी अँधेरी गुफा में फंस गई हूँ, जहाँ से निकलना लगभग असंभव सा लग रहा था। 
मै जब बहुत संघर्ष में घिरी थी और हर ओर से निराशा का सामना करना पड़ रहा था  जिन्दगी का कुछ भी मतलब नहीं रहा था. और जीवन की इन्ही झंझावातों में घिरी अपने ही विचारों में तल्लीन मई शाम के समय बगीचे की बेंच पर बैठी हुई थी …मेरे बाजू  में एक बुजुर्ग कब आकर बैठ गए मुझे  चला। " बड़ी गहरी सोच में डूबी  हो बेटी…?"
मैंने अचकचाकर अपना सिर उठाया और उनकी तरफ देखा पर  जवाब में कुछ भी कहते नहीं बना।  

" काफी दिनों से देख रहा हूँ।  यहाँ आकर चुपचाप बेंच पर बैठ जाती हो … मेरे ऐसे पूछने का बुरा तो नहीं लगा  … ?"

" नहीं अंकल! ऐसी कोई  बात नहीं  … " मुझसे कुछ कहते नहीं बना। 

उन्होंने कहा ," एक बात बोलू बेटा ! … बुरा तो नहीं मानोगी  …?"

मैंने न में सिर  हिलाया। तो वे बोले ," लगता है काफी परेशान हो  ....?"  मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ कि इन्हे कैसे पता चला जबकि ये तो मुझे जानते तक नहीं।  शायद वे मेरी प्रतिक्रिया को भांप गये थे और फिर जो बात उन्होंने मुझे कही उसने मेरी जिंदगी के प्रति सोच में क्रन्तिकारी परिवर्तन ला दिया। 




उन्होंने  मुझसे कहा ," बेटा ! याद रखना ,समय नहीं गुजरता पर लोग गुजर जाते हैं. सो स्वयम को गुजरने मत दो ओर अपने जीवन को एक मतलब दो, संघर्ष जीवन का हिस्सा है, ये समय भी गुजर जायेगा, हिम्मत मत हारो."

 और इस बात से  मेरी जिंदगी में जो सकारात्मक परिवर्तन आया, कहना नहीं होगा कि उसने मेरी जिंदगी को किस कदर बदला आज मै एक फैशन डिजानर और लेखक हूँ. 

याद रखें जिंदगी में हार मानकर बैठना नहीं है बल्कि संघर्ष कर ऊपर उठाना है। https://housing.com/lookup

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

आत्म विश्लेषण क्यों न करे एक बार..........

आत्म विश्लेषण क्यों न करे एक बार..........
कहते हैं की इन्सान दुनिया से मुँह चुरा सकता है पर स्वयं से नहींजब भी हम कुछ करते हैं अच्छा या बुरा हम स्वयं ही उसके गवाह और न्यायाधीश होते हैं, अगर अच्छा करते हैं तो खुद को शाबासी देते हैं और बुरा करते हैं तो स्वयं को कटघरे में खड़ा कर देते हैं,क्योंकि हम खुद के प्रति उत्तरदायी होते हैं पर ये सारी क्रिया हम दुनिया के सामने करने का साहस  कर सकते हैं … ??? नहीं … ना …!! क्योंकि हम दुनिया से मुँह चुरा रहे होते हैंहमारे  कार्य जीवन के प्रति हमारे नजरिये से जुड़े होते हैंहम क्या अच्छा करते हैं क्या बुरा करते हैं ये सब इसी नजरिये की  देन होता हैबुरा करने के बाद भी यदि हमें लगता है कि हमने सही किया है तो हम सही और गलत में फर्क कर पाने में असमर्थ होते हैं और यही से हम ढलान कि ओर सरकना शुरू हो जाते हैं जहाँ से सिर्फ और सिर्फ बुराई कि ओर चल पड़ते हैं और अपनी आत्मा कि आवाज की अनसुनी करने लगते हैं, क्योंकि हमारा मन या चेतना ,आत्मा इसे जो भी कहें हमारे अच्छे या बुरे कर्मों की साक्षी रहती हैवही हमें कटघरे में खड़ा कर सकती हैऔर वही जीवन के प्रति हमारे गलत नजरिये को सही कर सकती है.

बुराई को बड़ी सरलता से अपनाया जा सकता है और व्यक्ति बुराई की ओर जल्दी झुकता है क्योंकि बुराई हमेशा से इन्सान पर आसानी से हावी हो जाती है जबकि अच्छाई को अपनाने में कठिनाई आती है। अच्छाई में आत्मानुशासन की आवश्यकता होती है और अमूमन इन्सान  इसी बात से बचना चाहता है। अच्छाई का अगर रास्ता इतना ही आसान होता तो सारी  दुनिया में चारों ओर अच्छाई का ही बोलबाला होता, कहते हैं ना ,"बहुत कठिन है डगर पनघट की " , बिल्कुल अच्छाई के लिए यही बात सटीक बैठती  है।

 बुराई की सबसे  बुरी बात यही है कि वह इंसान को अपनी गिरफ्त में इस तरह से लेती है कि उसे सोचने का अवसर ही नहीं मिल पाता। बुराई वास्तव में एक मकड़जाल कि  मानिन्द है जिसमें एक बार उलझ गए तो निकल पाना पाना इतना सरल नहीं है। हाँ  …इससे  बाहर निकला जा सकता है, बशर्ते कि व्यक्ति जबतक स्वयं न चाहे। बुराई से बाहर निकलने के लिए हमारा विवेक और हिम्मत ही हमारा साथ दे सकते हैं। हौसला  और धीरज रखते यदि शान्त से   सोचेंगे तो हमें अपनी अपनाई हुई बुराई से बाहर निकलने का रास्ता मिल जायेगा।

जीवन के प्रति आशावादी और सकारात्मक सोच हमें बुराई कि तरफ जाने से रोकती है और अच्छाई का दामन थामे रखने में हमारी मदद करता करता है  … जरा थोड़ी देर के लिए एक बार रुकें  … और सोचें  … क्या वाकई आप किसी बुराई के शिकार तो नहीं  .... ?? अगर हैं तो कोई  बात नहीं आप उससे बाहर निकल सकते हैं  … बस  … एक कदम अच्छाई कि और बढ़ाएं तो सही  ....!!  

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