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सोमवार, 18 दिसंबर 2017

मेरी कविता - जीवन


जीवन




चित्र - google.com

जीवन
तुम हो  
 एक अबूझ पहेली,
न जाने फिर भी 
क्यों लगता है
तुम्हे बूझ ही लूंगी.
पर जितना तुम्हे 
हल करने की 
कोशिश करती हूँ,
उतना ही तुम 
उलझा देते हो.
थका देते हो.
पर मैंने भी ठाना है;
जितना तुम उलझाओगे ,
उतना तुम्हे 
हल करने में;
मुझे आनद आएगा.
और
इसी तरह देखना;
एक दिन 
तुम मेरे 
हो जाओगे. 
(वीणा सेठी)

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

बात एक अनकही सी....गीता का मनोविज्ञान



गीता का मनोविज्ञान
                   मनुष्य के जीवन का तात्पर्य समझना है तो भगवतगीता से अच्छा कोई स्त्रोत्र नहीं हो सकता. बेशक दुनिया के सारे धर्मग्रन्थ चाहे वो बाइबल, कुरान, गुरुग्रंथ साहिब हो अथवा गीता, सब एक ही बात सिखाते हैं,” जीवन में क्या नहीं करना चाहिए”. अब एक बात तो तय है कि हर व्यक्ति के पास बुद्धि और विवेक है और वो ये भी जानता है कि कुछ भी अच्छा करने या बुरा करने से क्या होता है...? “ मुझे ये चाहिए...?” अगर मन में ये बात आ जाये तो फिर मन अधीर हो उठता है, और ये चाहत उसे वो करने को मजबूर कर देती है; जिसे करने को हमारे धर्मग्रन्थ मना करते हैं. “ ये चाहिए”-हमारी पूरी चेतना इसी बिंदु पर केन्द्रित हो जाती है. अब मन ने यक़ीनन उसे पाने की तड़प के रास्ते में रूकावट आने पर क्रोद्धित तो अवश्य होना ही है. और विवेक पर से बुद्धि का नियंत्रण हटना अवश्यंभावी है. फिर पाने की इस चाहत में कुछ मिला तो नहीं अपितु स्वयं अपनी हानि अवश्य कर ली. 




        ‘कुछ चाहिए या नहीं चाहिए’ वास्तव में ‘होने या न होने’ का भ्रम मात्र ही है. इस मन:स्थिति से हम रोज दो-चार होते हैं. समस्या के मूल में यही बात है और हम ये जानते भी हैं पर मन जिद्दी बच्चे की तरह अड़े रहना चाहता है. यही कारण है कि जीवन में हमें वास्तव में क्या चाहिए...? इस बात को सोचने के बदले उन बातों में उलझ जाता है जो उसे जीवन के वास्तविक आनंद से दूर कर देती हैं. यही कारण है कि मानव जीवन जीने के भ्रम में ही अपनी तमाम उम्र गुजार देता है और वो भौतिक वस्तुओं के आस्वादन को ही जीवन का वास्तविक आनंद समझ लेता है. वास्तव में कुछ भी पाने की होड़ में व्यक्ति अपने जीवन के मूल से हट जाता है और जीवन के वास्तविक मूल्यों से परे अपने जीवन के अर्थ तलाशने लगता है. इसी मृगमरीचिका में जीवन रूपी तुरंग भटकता रहता है. जीवन के मूल को समझने की जड़ में यही मतिभ्रम वाली मन:स्थिति इंसान को जीवन के आनंद का रस नहीं लेने देती. चाहत की ये समस्या रिश्तों में भी दिखाई देती है. जबकि होना ये चाहिए की बाह्य संसार याने भौतिकता के प्रति हमारा भाव तटस्थ होना चाहिए याने सांसारिक वस्तुओं के प्रति एक प्रकार की निर्लिप्तता ही हमें जीवन के वास्तविक आनंद से परिचित करवा सकती है.


                      जीवन के प्रति यदि हम तटस्थ रहेंगे तो हम जीवन में वो सब कर सकेंगे जो वास्तव में एक मनुष्य का कर्म है. “कर्म” मानव जीवन का उद्देश्य है. वो इस पृथ्वी पर इसी लिए अवतरित हुआ है. गीता के मूल में ही कर्म योग है और ये कर्म योग तभी संभव है जब हम जीवन के प्रति तटस्थ भाव से सोचें. स्वामी विवेकानंद और शंकराचार्य ने भी जिन चार योगों की बात कही है उनमें कर्म योग सबसे श्रेष्ठ योग है और इसके लिए धार्मिक या अध्यात्मिक होने की आवश्यकता नहीं है. वास्तव में गीता कर्म आधारित जीवन की सर्वश्रेष्ट नियम पुस्तिका है. और इस पुस्तिका के प्रथम अध्याय में ही कृष्ण और अर्जुन के मध्य होने वाले संवाद में मानव मन के संघर्ष रूपी महाभारत का ही विषद वर्णन है. अर्जुन के माध्यम से मानव के “करूँ या न करूँ” या “होने या न होने”  के मानसिक संघर्ष को दर्शाया गया है. गीता सही अर्थों में मानव मन को समझने का मनोविज्ञान है.  (शेष)   
वीणा सेठी.



मंगलवार, 22 मार्च 2016

abke baras Holi men....



रिश्तों की मिठास 

फाल्गुन माह के लगते ही बसंत ऋतू  बिदाई की तैयारी कर रही होती है और साथ ही ठंडक अपने अवसान पर होती है. ऐसे समय में हवा में ठण्ड की खनक धीमी पड़ने लगती है और गर्मी दबे क़दमों से आ जाती है और फिजाओं में रंगत छाने लगती है.

फाल्गुन माह वास्तव में ऋतुओं के राजा बसंत की बिदाई का समारोह है जो रंगों की फुहार में सराबोर रहता है. भारत के उत्सव का ये वो रंग है जो रिश्तों में मिठास का रंग घोलता है. एक समय था जब भारतीय सिनेमा बिना होली गीत के मुकम्मल नहीं माना जाता था. अब भी होली इन गीतों की गूंज के बिना अधूरी है. होली के समय पूरी धरती धानी चूनर ओढ़ लेती है. हर ओर बस रंग की तरंग होती है. ये त्यौहार वैसे तो बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व  माना जाता है इस दिन लोग दुश्मनी भूलकर गले मिलते हैं और रिश्तों में और भी समीपता लाने कि कोशिश करते हैं . ‘बुरा न मानो होली है...! ‘ ये जुमला इस दिन हवाओं के सहारे पूरे वातावरण में डोलता रहता है.

होली हर साल आती है और लोग इस दिन का इंतज़ार बड़ी बेसब्री से करते हैं और इस दिन को और भी मजेदार और यादगार बनाने के लिए कई दिनों से तैयारी करते हैं. इस दिन कोई भी किसी को किसी पर भी रंग डालने से मना नहीं करता. फिर भी होली हर एक को अपने रंग में रंग दे ऐसा ही होगा ये कोई जरुरी तो नहीं. पर इतना जरुर है हर होली कोई न कोई खट्टी-मीठी यादें अपने पीछे छोड़ जाती है.  कुछ ऐसी ही पिछले साल की होली में हुई एक घटना की याद blog adda ने ताजा कर दी.  
होली के त्यौहार की कुछ न कुछ यादें हर इंसान के साथ धरोहर के रूप में रहती हैं. और  कुछ उसी तरह के यादों के पुंज का पीछा करते हुए मै अपनी अतीत की गलियों में विचरण करने निकल पड़ी और एक वृद्धाश्रम के सामने आकर रुक गई. ये पिछले साल कि होली की याद है और ये शायद मेरे जीवन की यादगार होली रहेगी. हमारे NGO ने decide किया था कि इस बार की होली कुछ इस तरह से मनाई जाये कि वो कुछ सार्थक हो सके. होली का पर्व वास्तव में जीवन में खुशियाँ भर देने का त्यौहार है, उदास चेहरों पर हंसी उड़ेल देने का आयोजन है. इन्ही सब बातों को ध्यान में रखकर हमने सोचा कि इस बार के होली में ऐसा ही कोई आयोजन करें कि जिससे किसी उदास चहरे और इंतज़ार करती आँखों में कुछ हंसी के रंग भर सके तो शायद हम ये समझ सकेंगे कि हमने जिंदगी में कुछ अच्छा करने की कोशिश की.

सबने ये तय किया कि सब घर से कुछ न कुछ बना के लायेंगे और हर सदस्य को एक-एक dish बनाकर लाने को कहा जिससे की खाने में वैरायटी भी होगी और किसी पर काम का बोझ भी नहीं पड़ेगा. इस वृद्धाश्रम का नाम “छाँव” है और ये हमारे शहर की एक कॉलोनी में स्थित है. यहाँ पर करीब 15-20 वृद्ध रहते हैं. हमने उस आश्रम के कर्ताधर्ता को ही केवल बताया था और हम उन लोगों को surprise देना चाहते हैं , जिसे कि उन्होंने मान लिया था. हमने तय किया था कि होली उनके साथ मनाएंगे और खाना-पीना भी उन्ही के बीच में करेंगे. जब हम उनके बीच पहुंचे तो उनके उदास चहरे देखकर हम भी दहल गए थे. जिंदगी के इतने बड़े  सच से हमारा इस तरह से सामना होगा, ये हमने कभी भी नहीं सोचा था. हम सबको वे हमारे नाना-नानी, दादा-दादी जैसे ही लग रहे थे. हर आँख में किसी अपने के लिए इंतज़ार साफ़ दिखाई दे रहा था और जब उनके विषय में पता चला तो लगा कि वाकई क्या खून का रंग इतना सफ़ेद हो गया है...? कि जिन्होंने उन्हें माता-पिता बनकर पाला और जीवन की इस संध्या में उन्हें मानसिक,शारीरिक और भावनात्मक संबल की अधिक आवश्यकता है उन्हें ही घर से पराया कर यहाँ पंहुचा दिया. ये सब देख कर एक बार तो रिश्तों से किसी का भी विश्वास उठ सकता है. पर...हम तो यहाँ विश्वास कायम करने आये थे और हमारी कोशिश से यदि उनके चहरे पर हंसी और ख़ुशी की लकीरें उभर आयें तो हमारा प्रयास सार्थक हो सकता था और ऐसा हुआ भी. जिंदगी की वो होली हम सबके जीवन की सबसे बेहतरीन होली थी. 

कोई हमारी नानी और कोई दादी बन चुकी थीं. उनसे हमें वैसा ही प्यार-दुलार मिला जैसा कि वो किसी अपने के साथ करते. सबके मन में ये निश्चय साफ़ झलक रहा था कि वे अपने परिवार के बजुर्गों के साथ ऐसा नहीं होने देंगे. हमारे NGO के सदस्यों ने आपस में तय किया कि हम अपनी कोशिशों से इन्हें इनके घरों को लौटाने का पूरा प्रयास करेंगे. और इस निश्चय के साथ हमने उनसे विदाई ली और उन्हें प्रॉमिस भी किया कि हम उनसे मिलने आते रहेंगे. आज फिर होली का त्यौहार है और इस साल में हमारे प्रयास से करीब 9 बुजुर्ग अपने घर वापिस जा चुके हैं. हमारी थोड़ी सी कोशिश से उनके जीवन में रिश्तों की मिठास घुल गई है. इस बार की होली को आप भी क्यों न कुछ इस तरह से मनाएं कि वो आपके जीवन को कोई सार्थक आयाम दे सके. (वीणा सेठी)




“I’m pledging to #KhulKeKheloHoli this year by sharing my Holi memories at BlogAdda in association with Parachute Advansed.”












मंगलवार, 22 जुलाई 2014

कविता

  जल ही जीवन है।

 जल ही जीवन है। 
ये सब जानते हैं ;
पर उसे जीवन कहाँ मानते हैं?
गर मानते
तो उसे प्रदूषित न करते;
यूँ ही व्यर्थ न करते;
उसे  अपने  और दूसरों 
के लिए सहेजते ;
संजोकर रखते। 
जल केवल हमारे लिए नहीं 
आने वाली पीढ़ियों की भी थाती है। 
ये बात हम जान लें ;
वक्त रहते तो अच्छा है। 
नहीं तो यही जल 
पछतावे की शक्ल में ;
आँखों से आँसू बन टपकेगा।


रविवार, 16 मार्च 2014

contes by british airways-go further get closer



प्यार का एक पल आपकी तमाम जिन्दगी...


प्यार एक ऐसा शब्द, जो बोलने के साथ ही वातावरण में एक जादू सा कर देता है और हर इन्सान इसके आकर्षण में बंधा रह जाता है. प्यार की कोई भाषा नहीं होती फिर भी यह दुनिया में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है. चक्कर खा गए न आप भी...! 


अरे बाबा ...! प्यार है ही इतनी मधुर बोली, जो किसी भी भाषा की मोहताज नहीं. ये बोलने की नहीं महसूस करने का अमूर्त भाव है.
ये एक खुश्बू है जो जब भी माहौल में फैलती है तो उसी में रच-बस जाती है. ये वो शब्द है जो एहसास के दायरे में आते ही कायनात बन जाता है. यूं तो विज्ञान ने इसे कुछ रासायनिक योगिकों का दिलफरेब समीकरण माना है. और ये भी साबित हो चुका है कि ये दिल से नहीं दिमाग से शुरू होता है क्योंकि जब ये एहसास जगता है तो दिमाग का एक हिस्सा विशेष रूप से सक्रिय हो जाता है. 

जैसा मैंने महसूस किया है –प्यार का एक पल आपकी तमाम जिन्दगी के लिए अमूल्य होता है, जरुरी नहीं की वह आपकी जिन्दगी भर का साथ बन सके, पर प्यार का वो पल आपकी जिन्दगी जरुर बन जाता है और वही पल जीवन भर आपके साथ चलता है.


खैर...! प्यार में दो लोंगों के बीच एक खुबसूरत पल आता है जब दोनों को लगता है- यही है वो जिसे कुदरत ने मेरे लिए और केवल मेरे लिए दुनिया में भेजा है. और दोनों को एक दूसरे का साथ शिद्दत से चाहिए होता है. जब दो लोगों के मध्य ऐसा पल आता है तब वे एक दूसरे से नितांत ही अन्जान होते हैं. और उनके प्यार की इन्तेहां नहीं होती, वे आपस में एक दूसरे के लिए किसी भी हद तक जाकर त्याग करने तो तत्पर रहते हैं.
प्यार इन्सान के अन्दर इन्सानियत का ज़ज्बा पैदा करने की ताकत रखता है. वास्तव में प्यार जब होता है तो इन्सान एक फेंटसी और vartual world में चला जाता है,जहाँ सब कुछ हसीन और रंगीन होता है.l 

 जैसे-जैसे वो अगली पायदाने चढ़ता जाता है; उसमें बंधे दोनों की एक दूसरे की आदतें, पसंद-नापसंद, व्यवहार, जीवन जीने के ढंग के बारे में पता चलता जाता है.यही वो मोड़ होता है जहाँ प्यार की परीक्षा होती है, ये वो मोड़ होता है जहाँ पर प्यार कभी-कभी दम भी तोड़ देता है. क्योंकि सामान्यतः ये मानव स्वाभाव है या उसके स्वाभाव की कमजोरी कह लो कि जिन्दगी की असलियत से जब सामना होता है तो हम अपनी कमी या कमजोरी को तो स्वीकार कर लेते हैं पर सामने वाले की वही कमी उसका दुर्गुण लगने लगती है और उसे हम स्वीकार नहीं कर पाते. और प्यार में भी यही होता है –असलियत से सामना होते ही वो हवा-हवाई हो जाता है, जबकि प्यार बिना शर्त के किया और निभाया जाता है ,अन्यथा वो स्वार्थ होता है.


मेरी नज़र में तो प्यार में इन्सान एक दूसरे को उसकी कमियों के साथ अपनाना चाहिए. ये निस्वार्थ प्रेम का शुध्द रूप है और तभी आप अपने प्रेम को ताउम्र पा सकते हैं और उसे निभा सकते हैं पर इसका मतलब ये नहीं की किसी की कमजोरी आप स्वीकार तो कर रहे हैं पर वो ऐसी हो की जी का जंजाल बन जाये, बल्कि होना ये चाहिए कि अपने साथी को आप समझा सकें की वो गलती पर है और प्यार में कौन है जो अपने को न बदलना चाहे...? क्यों ठीक है न...??
प्यार में किसी भी हद तक जाया जा सकता है. पर ठहरें...! मेरा ये तात्पर्य नहीं है कि आप अपने आप को ही भूल जाएँ. ये न भूलें आप की एक शख्सीयत है जिसको देखकर ही आपके साथी के मन में पहली बार प्रेम की भावना जगी थी और उसी शख्सियत से आपका साथी प्यार करता है. मुझे लगता है की प्यार में जिस हद तक जाना है- उसका यही मतलब है कि आप अपने साथी जैसे हो जाएँ या फिर उसे अपने रंग में रंग लें. प्रेम एक शुद्ध और सात्विक भावना है जिसमें शरीर का कोई खास महत्व नहीं होता अगर इस आकर्षण से प्रेम की शुरुआत है तो वह प्रेम नहीं केवल वासना होती है. और ऐसा प्रेम कुछ समय के बाद स्वतः ही अपना महत्व खो देता है.

मै प्रेम के इसी स्वरुप को स्थान देती हूँ. और इसके लिए अपने साथी के लिए यदि स्वयं को बदलना पड़े तो भी कोई बात नहीं. मेरे शब्दों से ये मतलब न निकालें कि प्रेम के लिए स्वंय के अस्तित्व को दाव पर लगा दिया जाये, बल्कि अपने विवेक का उपयोग कर अगर खुद को अपने साथी के अनुरूप करेंगे तो निश्चित जानिए की वो भी अवश्य ही ऐसा ही करेगा. प्यार में इन्सान इतना खो जाता है कि दोनों एक दूसरे के मन की बात बिना कहे ही समझ जाते हैं. सवाल एक की आँखों में होता है उसे मुँह से कुछ भी बोलना नहीं पड़ता और जवाब मिल जाता है. ऐसा मैंने शिद्दत से महसूस किया है. ये तभी होता है जब दोनों एक दूसरे के अनुकूल खुद को ढाल लेते हैं और इस हद तक बदल लेते हैं कि दोनों दो अलग शख्सियतें न होकर एक हो जाती हैं. पर ये तभी होता है जब दोनों में एक दूसरे के लिए खुद को बदलने का ज़ज्बा हो.

प्यार में आपसी समझ, एक-दूसरे को सम्मान देना, एक दूसरे की तकलीफ को बिना कहे समझ जाना जरुरी है. यहाँ पर एक प्रसंग का जिक्र जरुर करना चाहूंगी. एक बार कबीर के पास एक व्यक्ति गया और उनसे पूछने लगा कि जीवन साथी कैसा होना चाहिए...? उनके बीच में प्रेम का स्वरुप कैसा होता है ...? तिस पर कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया और अपनी जीवन संगिनी रत्ना को आवाज लगे... रत्ना...! देखो तो बाहर कितना अंधेरा हो गया है... जरा...! दिया तो जलाकर रख जाना...! कहना न होगा की वह व्यक्ति आश्चर्यचकित रह गया, जब उसने देखा कि रत्न बिना कोइ प्रश्न किये दिया जलाकर दोनों के सामने रख गई. और वह समय ठेठ दोपहर का था जब भगवन भास्कर पूरी तरह से अपने प्रकाश से संसार को आलोकित कर रहे थे. उस इन्सान को अपने प्रश्न का उत्तर बिना बोले ही मिल गया था. बस केवल इतना ही  ...

आखरी में मै मेरे शब्दों में केवल इतना ही कहना चाहती हूँ:-
तेरे प्यार में मै इस कदर खो गया हूँ
कि तेरे आँखों में जब भी खुद को देखता हूँ
............तेरा ही अक्स उसमें पाता हूँ.
(वीणा सेठी) 
------------------------------------------------------------------------------------ http://bit.ly/1epU8Uj

To watch go further get closer, click the link given below
http://www.youtube.com/watch?v=ixbLMsVlpes

शनिवार, 15 मार्च 2014

मेरी शब्द यात्रा

मेरी शब्द यात्रा:प्रवाह ...



प्रवाह याने बहाव, जो एक निरंतरता का सूचक है.प्रवाह किसी भी बात के लिए हो सकता है चाहे वो विचारों के लिए हो या फिर पानी का, या फिर जीवन धारा का. - उसके मूल में है सिर्फ चलते रहना, ठीक मानव जीवन की तरह-


एक शब्द है जीवन धारा- जो यही दर्शाता है की इन्सान का जीवन चलते रहने का नाम है यदि ये निरंतरता खंडित होती है तो या तो मानव जीवन समाप्त हो गया है या हमारे जीवन में एक जड़ता आ गई है .


जीवन में प्रवाह आवश्यक है यदि ये रुक जाये तो अपना महत्व खो देता है और व्यक्ति को अपने इर्द-गिर्द सब कुछ जड़ लगें लगता है और उसे अपने जीवन के प्रति एक उदासीनता का भाव आ जाता है, उसे अपना जीवन अर्थहीन लगने लगता है, बहुधा ये तभी होता है जब हम अपने प्रयासों में निरंतरता याने प्रवाह नहीं रखते और थोड़े प्रयासों से ही बहुत कुछ की चाहत करने लगते हैं, एक और स्थिति  में भी हमारे जीवन का प्रवाह रुक जाता है जब हम भावनात्मक रूप से या संवेदना के स्तर पर आहात होते हैं तो हमारा जीवन के प्रति विश्वास कमजोर पड़ जाता है और यही हमारे जीवन के प्रवाह को कम कर देता है या रोक देता है . इस स्थिति से हमें स्वयं ही बाहर निकल पड़ता है लोग आपकी सहायता तो कर सकते हैं पर अपनी स्थिति से उबरना खुद को ही पड़ता है और मानव जीवन है तो उसके प्रवाह को बनाये रखना हमारी  जिम्मेदारी है .

विचारों का प्रवाह हमे निरंतर गतिशील रखता है विचार है तो उनपर सोचने की प्रक्रिया ही विचारों का प्रवाह है अपने आसपास के वातावरण के प्रति हमरी प्रतिक्रिया हमारे विचारों के प्रवाह से ही झलकती है. विचार हमें आभास करते हैं की हम मानव हैं और हमारा जीवन उपयोगी और कीमती है उसे व्यर्थ न जाने दें...........विचारों में प्रवाह हमारी चेतना से जुड़ा है.विचारों में बहाव हमें विचारों को परिष्कृत करता है और दूसरों की भावनाओं और संवेदनाओं को बेहतर ढंग से समझने में हमारी सहायता करता है .



जल बिना प्रवाह के अपना वजूद खो देता है, जल का प्रवाह हमें जीवन से जोड़ता है और उसके प्रवाह का ध्यान हमें ही रखना होगा, जल का प्रवाह ये सन्देश भी देता है की मानवीय भावना और प्यार हमेशा उपर से नीचे याने माता-पिता से अपनी संतान की और प्रवाहित होता है.


आइये हम भी प्रवाह से जुड़े और अपने रिश्तों को मजबूत करें .

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

आत्म विश्लेषण क्यों न करे एक बार..........

आत्म विश्लेषण क्यों न करे एक बार..........
कहते हैं की इन्सान दुनिया से मुँह चुरा सकता है पर स्वयं से नहींजब भी हम कुछ करते हैं अच्छा या बुरा हम स्वयं ही उसके गवाह और न्यायाधीश होते हैं, अगर अच्छा करते हैं तो खुद को शाबासी देते हैं और बुरा करते हैं तो स्वयं को कटघरे में खड़ा कर देते हैं,क्योंकि हम खुद के प्रति उत्तरदायी होते हैं पर ये सारी क्रिया हम दुनिया के सामने करने का साहस  कर सकते हैं … ??? नहीं … ना …!! क्योंकि हम दुनिया से मुँह चुरा रहे होते हैंहमारे  कार्य जीवन के प्रति हमारे नजरिये से जुड़े होते हैंहम क्या अच्छा करते हैं क्या बुरा करते हैं ये सब इसी नजरिये की  देन होता हैबुरा करने के बाद भी यदि हमें लगता है कि हमने सही किया है तो हम सही और गलत में फर्क कर पाने में असमर्थ होते हैं और यही से हम ढलान कि ओर सरकना शुरू हो जाते हैं जहाँ से सिर्फ और सिर्फ बुराई कि ओर चल पड़ते हैं और अपनी आत्मा कि आवाज की अनसुनी करने लगते हैं, क्योंकि हमारा मन या चेतना ,आत्मा इसे जो भी कहें हमारे अच्छे या बुरे कर्मों की साक्षी रहती हैवही हमें कटघरे में खड़ा कर सकती हैऔर वही जीवन के प्रति हमारे गलत नजरिये को सही कर सकती है.

बुराई को बड़ी सरलता से अपनाया जा सकता है और व्यक्ति बुराई की ओर जल्दी झुकता है क्योंकि बुराई हमेशा से इन्सान पर आसानी से हावी हो जाती है जबकि अच्छाई को अपनाने में कठिनाई आती है। अच्छाई में आत्मानुशासन की आवश्यकता होती है और अमूमन इन्सान  इसी बात से बचना चाहता है। अच्छाई का अगर रास्ता इतना ही आसान होता तो सारी  दुनिया में चारों ओर अच्छाई का ही बोलबाला होता, कहते हैं ना ,"बहुत कठिन है डगर पनघट की " , बिल्कुल अच्छाई के लिए यही बात सटीक बैठती  है।

 बुराई की सबसे  बुरी बात यही है कि वह इंसान को अपनी गिरफ्त में इस तरह से लेती है कि उसे सोचने का अवसर ही नहीं मिल पाता। बुराई वास्तव में एक मकड़जाल कि  मानिन्द है जिसमें एक बार उलझ गए तो निकल पाना पाना इतना सरल नहीं है। हाँ  …इससे  बाहर निकला जा सकता है, बशर्ते कि व्यक्ति जबतक स्वयं न चाहे। बुराई से बाहर निकलने के लिए हमारा विवेक और हिम्मत ही हमारा साथ दे सकते हैं। हौसला  और धीरज रखते यदि शान्त से   सोचेंगे तो हमें अपनी अपनाई हुई बुराई से बाहर निकलने का रास्ता मिल जायेगा।

जीवन के प्रति आशावादी और सकारात्मक सोच हमें बुराई कि तरफ जाने से रोकती है और अच्छाई का दामन थामे रखने में हमारी मदद करता करता है  … जरा थोड़ी देर के लिए एक बार रुकें  … और सोचें  … क्या वाकई आप किसी बुराई के शिकार तो नहीं  .... ?? अगर हैं तो कोई  बात नहीं आप उससे बाहर निकल सकते हैं  … बस  … एक कदम अच्छाई कि और बढ़ाएं तो सही  ....!!  

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