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रविवार, 8 जून 2014

कविता



कविता:एक नई पहचान

मुस्कराहट
उसकी आँखों से उतरकर;
ओठों को दस्तक देती
कानों तक फ़ैल गई थी.
ये मुस्कराहट
उसकी सच्चाई की जीत
और
उपलब्धियों से आई थी.
वो थी:
एक लड़की
कदम-कदम पर
उसे ये बात;
याद कराई जाती थी.
बहुत बार
हताश-निराश हो,
वह
वापिस जाना चाहती थी;
पर हर बार
उसकी माँ की कही बात,
उसे याद आ जाती थी.
बेटी ...!
पहले अपने अंदर की
कमजोरी को जीतना,
याद रखना
तुम एक लड़की नहीं:
पहले एक इंसान हो.
आधी लड़ाई तो
तुम यही जीत जाओगी.
बाकि आधी:
जब लक्ष्य सामने नज़र आये,
अर्जुन बन
बस उसे बेध देना,
तब जीत जाओगी.
देखना तब:
समय और
तुम्हारे चारों ओर बहता,
सब कुछ थम जायेगा.
और
करतल ध्वनियों का कोलाहल
तुम्हारी सफलता को
और तुम्हे
एक नई पहचान दे जायेगा.

वीणा सेठी

शनिवार, 8 मार्च 2014

कविता:





महिला दिवस -8 मार्च 





एक नई पहचान

मुस्कराहट
उसकी आँखों से उतरकर;
ओठों को दस्तक देती
कानों तक फ़ैल गई थी.
ये मुस्कराहट
उसकी सच्चाई की जीत
और
उपलब्धियों से आई थी.
वो थी:
एक लड़की
कदम-कदम पर
उसे ये बात;
याद कराई जाती थी.
बहुत बार
हताश-निराश हो,
वह
वापिस जाना चाहती थी;
पर हर बार
उसकी माँ की कही बात,
उसे याद आ जाती थी.
बेटी ...!
पहले अपने अंदर की
कमजोरी को जीतना,
याद रखना
तुम एक लड़की नहीं:
"पहले एक इंसान हो".
आधी लड़ाई तो
तुम यही जीत जाओगी.
बाकि आधी:
जब लक्ष्य सामने नज़र आये,
अर्जुन बन
बस उसे बेध देना,
तब जीत जाओगी.
देखना तब:
समय और
तुम्हारे चारों ओर बहता,
सब कुछ थम जायेगा.
और
करतल ध्वनियों का कोलाहल
तुम्हारी सफलता को
और तुम्हे
एक नई पहचान दे जायेगा.
वीणा सेठी

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

.मेरी शब्द यात्रा-4 ललक...

ललक---सकारात्मक--नकारात्मक भी...




"ललक " ऐसा शब्द है जो बोलने के साथ ही अपने अर्थ का एहसास करा देता है.कोई वास्तु जो मन को भाती हो और जिसे  देखते ही या उसका नाम लेते ही मन में  उसे पाने की चाहत जाग  जाये  "ललक" है.बच्चा चाँद को देखकर उसे अपने हाथों  में लेने ले लिए मचल जाया करते हैं, उनकी ये चाहत उनकी ललक है.

'पाने की ये चाहत' का ये भाव केवल पाने की सोच से पर ही आकर ख़त्म हो जाता है. उसके लिए प्रयास करना या चेष्टा करना 'ललक' के लक्षणों  में शामिल नहीं होता.

ललक मन में उठने वाला आवेग है जो तभी  उठता  है  जब मनचाही वस्तु या बात आँखों के सामने आ जाये.पद पाने की ललक, जीवन में  ऐश्वर्य पाने की ललक का अच्छा या बुरा होना इस बात से तय होता है वह ललक सकारात्मकता से उपजी  है या फिर नकारात्मकता से.

सकारात्मकता  से  उपजी ललक अच्छे परिणाम देती  है किन्तु ललक यदि द्वेष, इर्ष्या या डाह के कारण उत्पन्न होती है तो नकारात्मकता की ओर ले जाती है और कुपरिणाम देती है.

"ललक" मात्र एक चाहत है,अतः यह उद्विग्नता उत्पन्न नहीं करती. यदि ललक के वशीभूत मनुष्य उद्विग्न भी हो जाये तब भी वह सतही होती है.और पानी में उठने वाले बुलबुलों  की तरह शांत भी हो जाती है.'ललक' तभी जन्म लेती है जब उक्त ललक के लिए पार्यप्त कारक और परिस्थितियां एक साथ मौजूद हों.

ललक सकारात्मक- ललक सकारात्मक भावना लिए होती है, तो वातावरण में  खुशनुमा एहसास होता है और ये सफलता के लिए एक कदम साबित हो सकता है, क्योंकि सकारात्मक ललक उत्प्रेरक का काम करता है. जिस वास्तु या बात के लिए ललक पैदा होती है उसे पाने की और एक कदम बढ़ने के लिए प्रेरणा भी बन जाती है.

नकारात्मक ललक- ललक यदि ईर्ष्या या द्वेष के कारण उत्पन्न हो  तो वह हमारी सोच   को विकृत कर देती हैऔर मन में बेचैनी भी बढ़ा देती है. ये पाने की चाहत न होकर दूसरे  से छीनने की प्रवृति बन सकती है, अतः जहाँ तक संभव हो नकारात्मक ललक यदि मन में उत्पन्न हो भी जाये तो उसे सप्रयास अपने मन से हटा लेना चाहिए.

ललक मन में अवश्य  पैदा होने दें किन्तु वह जीवन का लक्ष्य को पाने की हो और उसे कभी भी अपने हृदय से दूर न करें बल्कि रोह उसे स्मरण करें ताकि आप के लक्ष्य के प्रति ये 'ललक' उसे पाने की तीव्र इच्छा में बदल जाये. जीवन के प्रति सकारात्मक रहने के लिए यह भी आवश्यक है.
........................................................................वीणा सेठी ...................................................................

  







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