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शनिवार, 9 जनवरी 2016

एक जिंदगी सम्मान भरी-#SpreadTheVibe to @YouthKiAwaaz and @indiblogger.

परिवर्तन 

जिंदगी का हर पल स्वत: प्रसूत अनुभूतियों से भरा है, जो की कुछ न कुछ सिखा ही देता है. बेशक सिखने की चाहत दिल में हो तो...! गया साल कुछ खट्टी और कुछ मीठी स्म्रतियों के साथ विदा हो गया. इन यादों में कुछ बातें और घटनाएँ ऐसी भी थीं जो इस साल तो क्या आने वाले सालों तक याद रहेंगी और स्म्रतिपटल पर रह-रह कर कौन्घेंगी. गुजरे साल कि एक घटना जिसकी साक्षी मै स्वयं भी रही हूँ ने मुझे जिंदगी में न भुलाने वाले यादगार पल सहेज के रखने को दिए हैं. # Spread the vibe to @YouthKiAwaaz and @indiblogger.के प्लेटफोर्म  के जरिये मै इसे शेयर करना चाहती हूँ. 

दिव्या दी एक एन.जी.ओ. का हिस्सा हैं  और अपना  होम फर्निशिंग का छोटा सा व्यवसाय भी चलाती हैं. इस काम को वर्कशॉप में 10- 15 महिलाओं कि सहायता से करती हैं. यहाँ वे  डिज़ाइनर और hand embroidery के बने प्रोडक्ट तैयार करते हैं. उनका  फोकस traditional और tribal hand embroidery पर रहता है.. जब काम कुछ बढ़ने लगा तो उन्होंने सोचा कि कुछ और महिलाओं को जोड़ा जाए. वे प्रायः गरीब तबके की महिलाओं को ही काम पर रखती हैं. पर... उन्हें ये समझाना बेहद मुश्किल होता है की वे मेहनत से और अपने बल पर अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकती हैं. वर्कशॉप में महिलाओं को काम देने से पहले उन्हें महीने भर का नि:शुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है. इस बार जो महिलाएं काम करने आईं उनमें एक चेहरा माया का भी था. वो प्रायः ख़ामोशी से अपना काम करती थी और किसी के साथ बातचीत में हिस्सा नहीं लेती थी.माया  दिव्या दी के  एन.जी.ओ. की ओर से ही आई थी. उसके अतीत के विषय में उन्हें पता था किन्तु ये बात वर्कशॉप में काम करने वाला कोई भी नहीं जानता था. 

माया  के पास एक हुनर था, गुड़िया बनाने का. वो कपड़े पर हाथ,पैर और धड़ की  आकृति काटकर उसे सिल कर उसमें रूई भर देती थी, फिर बाजार  में मिलने वाले पी ओ पी के बने चेहरे उनपर लगाकर उसे अलग अलग प्रान्तों की पोशाक से सजा देती थी. ये गुड़िया बेहद जीवंत लगती थीं. धीरे-धीरे माया उनके साथ खुलने लगी थी पर फिर भी वो अपने काम से काम रखती थी. वो सबसे ज्यादा खुल कर बात करने से शायद अपने अतीत के कारण डरती थी और उसका डर भी सही था. कभी-कभी वो दी से खुलकर  बात कर लिया करती थी. पर जैसा कि कहते हैं न “ सत्य कभी छुपता नहीं” , माया का भी अतीत उन्हें पता चल गया था. उन महिलाओं में मालती नामकी एक दबंग महिला भी थी उसने माया के खिलाफ मोर्चा खोल दिया कि यदि वह यहाँ काम करेगी तो वे सब काम नहीं करेंगी.दी के सामने बेहद विकट परिस्थिति खड़ी हो गई, पर...उन्हें  निर्णय तो लेना ही था. माया को एन.जी.ओ. की ओर से ही ये आश्वासन मिला था कि उसे उसके सामान्य जीवन में लौटने और सम्मानपूर्वक जीवन जीने में वे सहायता करेंगे और इसके लिए ही उसे दिव्या दी अपनी जिम्मेदारी पर अपने साथ काम करवाने के लिए लेकर आई थी. उन्हें  फैसला तो लेना ही था और लिया भी. उन्हें महिलाओं से साफ़ साफ़ कहना पड़ा कि वे चाहें तो काम छोड़ कर जा सकती हैं, उन्हें उम्मीद नहीं थी कि वे इस तरह से कह सकती हैं. उन्हें बेहद समझाने की कोशिश की कि माया के बारे में कोई नहीं जानता और उन्हें उसके साथ अपने जैसा ही समझ कर सलूक करना चाहिए पर उन्होंने दी की  बात को सिरे से ही ख़ारिज कर दिया.

दूसरे दिन कोई भी महिला वर्कशॉप में काम करने नहीं आई, केवल माया अकेली थी. उसने कारण जानना चाहा तो दी टाल गई. पर... वो समझ गई और उसने दूसरे दिन से आना बंद कर दिया. 2-4 दिन के लिए वर्कशॉप का काम पूरी तरह से ठप्प पड़ गया. दी के लिए अब काम करने के लिए नई महिलाओं कि जरुरत आन पड़ी,पर... ये काम इतना आसान न था. उन्होंने अपने एन.जी.ओ. से संपर्क साधा और उनके लिए एक नया ही मार्ग खुल गया. एन.जी.ओ. और दी ने मिलकर ये निर्णय लिया कि क्यों न माया जैसी महिलाओं को काम दिया जाये जिससे कि वे औरतें एक आम इसांन कि तरह सम्मान से जीवन जी सकें. माया को उनका इंचार्ज बना दिया गया और दी काम एक बार फिर रफ़्तार पकड़ने लगा. पुरानी महिलाओं को ये उम्मीद नहीं थी कि दी अन्य महिलाओं को काम पर रख लेंगी. धीरे धीरे जब उनको पैसों की कमी खलने लगी तो वे दी के पास काम पर लौटने की बात करने लगी पर तब तक देर हो चुकी थी और उन्हें ये भी नहीं पता था कि दूसरी महिलाएं कौन हैं...? जब वे दी से मिली तो उन्हें पता चल गया तो वे सोच में पड़ गईं कि अब क्या किया  जाये...? क्योंकि आर्थिक रूप से विपन्न होने के कारण काम करने कि मज़बूरी थी पर ... माया जैसी महिलाओं के साथ...? दी चाहती थीं कि वे उन महिलाओं के साथ ख़ुशी से काम करें न की लाचारी में. दी ने उन्हें समझाया कि वे सब इस व्यवसाय में अपनी इच्छा से नहीं गई वरन उन्हें इस ओर धकेलने वाला समाज या स्वयं घर वाले ही थे. उनकी कहानियां सुन महिलाओं के दिल दहल गए और वे उनकी मज़बूरी समझ गई. अब वे सब एक छत के नीचे काम कर रहीं हैं. दी ने उनसे वचन लिया कि वे उन महिलाओं के बारे में किसी दूसरे को नहीं बतायेंगी. और सबने ऐसा ही किया . आज ये ग्रुप दिव्या दी के साथ उनके व्यवसाय में अपना योगदान दे रह है और मै इस सब घटना की एक मूक गवाह हूँ.

 ये बात यहीं पर ख़त्म नहीं होती ये मिशनदिव्या दी ने 2014 में शुरु किया और अपनी लड़ाई को वे 2015 में ही ख़त्म कर पाईं. उन्हें पता था कि ये बात यदि खुल गई तो वे उन महिलाओं के साथ न्याय नहीं कर पाएंगी. इसलिए मै भी इस घटना के स्थान का उल्लेख किये बिना और नामों में परिवर्तन कर लिख रही हूँ. शायद ये ब्लॉग पढ़कर कोई और भी समाज में इस तरह के परिवर्तन का साहस करे और ये परिवर्तन लोगों कि सोच को बदल सके ताकि उनके बारे में लोगों को खुल कर बताया जा सके. जिससे वे आने वाले समय में एक सम्मान भरी जिंदगी जी सकें. (वीणा सेठी)





सोमवार, 21 दिसंबर 2015

नारी इंसान है पहचानो


नारी इंसान है सामान नहीं



“I’m writing this blog post to support Amnesty International’s #KnowYourRights campaign at BlogAdda.


एक समय  भारत में बनी एक फिल्म, नाम तो मुझे नहीं पता पर शायद 1950 या 60 के दशक में बनी का ये गाना बड़ा मशहूर हुआ था,...” औरत ने जन्म दिया मर्दों को; मर्दों ने उसे बाजार दिया...” और ये एक लाइन ही भारत जैसे देश में औरत की सामाजिक हैसियत या रुतबे की पोल खोलती है. तब भी औरत हाशिये पर खड़ी  थी और आज भी वही खड़ी है. हमारे समाज में नारी माँ के रूप में तो पूज्यनीय है पर नारी एक इंसान के रूप में कोई महत्त्व नहीं रखती. इसका साफ़-साफ़ कारण एक ही है जो उसे इंसान के रूप में स्थापित नहीं करता, और वो है नारी के प्रति पुरुष का नजरिया.  भारत क्या पूरी दुनिया में नारी को दोयम दर्जे का समझा जाता है और उसे पुरुष के साथ कदम से कदम मिलकर चलने की वास्तविक अर्थों में आजादी आज तक नहीं मिली, वह पुरुष की परछाईं की तरह पीछे चले तभी उसे सम्मान के लायक समझा जाता है.

 
नारी इंसान है पहचानो


वास्तव में नारी आज भी इंसान से ज्यादा सामान समझी जाती है. अब सामान केवल उपयोग में ही लाया जाता है और अनुपयोगी होने पर फेंक देने के अलावा उसका कुछ नहीं किया जा सकता. यदि ऐसे में नारी के साथ sexual violence होता है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं. नारी एक सामान से अधिक कुछ नहीं है तो जैसा कि उसे समझ और माना गया है- तो ऐसे में उसके साथ sexual violence हो रहा है और जिस तरह से graph ऊपर जा रहा है उससे वो अपने आप को अपने घर में भी महफूज नहीं पा रही है तो इसे रोकना अब जरुरी हो गया है. 


जैसा की सब जानते हैं पिछले 3-4 सालों से महिलाओं के साथ sexual violence के cases ज्यादा हो रहे हैं और उनकी ख़बरें भी प्रिंट और digital media में काफी coverage के साथ छपने और दिखाई जाने लगी हैं तो जरुरी हो जाता है कि ऐसी कोई भी खबर भेदभाव के छपी या दिखाई जाएँ. कुछ कारणों से ये अब बेहद जरुरी है कि ये news जरुर दिखाई या छपी जाये.

·     *    भारत में महिलाओं के प्रति होने वाले sexual violence के लिए लोगों में जागरूकता जागनी चाहिए और जगाई जानी चाहिए. जब तक लोगों के नारी के प्रति संवेदना नहीं जागेगी तब तक sexual violence की शर्मसार कर देने वाली घटनाएँ नहीं रुकेंगी. 

·        * बलात्कार के लिए पुरुष दोषी होता है और उसका खामियाजा अक्सर नहीं भुगतती है क्योंकि उसके लिए उसे ही दोषी माना जाता है और जब लोग ये जान लेते हैं तो उसकी जिंदगी को जहन्नुम बनाने में ये समाज देर नहीं लगाता. एक तो वह मानसिक और शारीरिक रूप से इस कदर घायल हो चुकी होती है कि उसे अपनी समस्या का हल आत्महत्या के रूप में ही नजर आता है. ये भारतीय समाज का वो शर्मनाक पहलू है जिसकी अब दुनिया को भी खबर होने लगी है. और भारतीय समाज अपने दोगलेपन को छुपाने के लिए अब अपनी अच्छी छवि बनाना चाहता है पर उसके इस दोगलेपन को उजागर करने के लिए जरुरी है कि इस तरह के sexual violence की reporting जरुर होना चाहिए. ताकि लोगों के सामने सच आये और लोगों की सोच भी उस पीड़ित के प्रति सहानुभूतिपूर्ण हो- जिससे वो फिर से एक सम्मान भरी जिंदगी की ओर लौट सके और सामान्य जीवन जी सके. 

·      *   नारी पहले एक इंसान है और उसे एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में समाज में स्थान मिलना चाहिए और ये तभी संभव है जब उसके प्रति सम्मान और संवेदना की भावना समाज में पनपे. ये तभी सम्भव है जब इस तरह के sexual violence की इंसानियत को शर्मसार करने वाले incident हों तब जो लोग बेहद casual सी reaction देते हैं, उन्हें रोका जाये और ऐसे लोंगों के खिलाफ बकायदा लामबंद होना जरुरी है. तभी लोग इस तरह के violence की intensity को समझ पाएंगे और उनकी संवेदना को झकझोरना बेहद आवश्यक है. ऐसे लोगों को ये समझ आना चाहिए कि जिस सतही ढंग से वे इस तरह की घटनाओं को ले रहे हैं उस तरह का शिकार उनका भी कोई अपना हो सकता है. जब तक लोगों के अंदर इस तरह की सोच नहीं जागेगी, हमारे देश में नारी का अपमान sexual violence की शर्मनाक घटनाओं के रूप में होता रहेगा.


अब वास्तव में समय आ गया है कि नारी के प्रति सदियों पुरानी  सोच को लोग बदलें और ये काम print और digital media के माध्यम से बेहतर ढंग से हो सकता है. क्या... आपको नहीं लगता मै शै कह रही हूँ.
केवल इतना ही मुझे कहना है.  (वीणा सेठी).

मंगलवार, 8 मार्च 2011

..बात एक अनकही सी -9......... (8 march महिला दिवस)

ये भी हक़दार है सम्मान की.....................

फिर से एक और साल का एक और दिन और नारी के नाम ८ मार्च विश्व महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है. पत्र- परिकाओं में, इन्टरनेट पर  इस दिन के लिए महिलाओं की जोरदार पैरवी होगी. प्रसिद्ध  महिलाओं को सम्मानों से तथा पुरुस्कारों से नवाजा जायेगा, उनके लिए समारोहों का आयोजन होगा और फिर इस दिन को एक और आने वाले साल के लिए इसी दिन को पुन: मनाने के लिए जिस संदूक से निकला जाता है वहीं रख दिया जाता है, ताकि सालभर का गर्द-गुबार उस पर जमती रहे और हम इस दिन को भुलाकर फिर अपनी दुनिया में खो जायेंगे. 



नारी के लिए ये एक दिन नदी की उपरी सतह पर बहने वाली तीव्र धारा की तरह है परन्तु नदी की तलहटी में भी ख़ामोशी से भी  निरंतर बहने वाली धारा है , ठीक उन खामोश नारियों की तरह जो खेत-खलिहानों, घरों में , कारखानों में पूरी दुनिया में एक आम नारी साल भर निरंतर अपने दायित्व का निर्वाह करती है इस बात से अनजान की उनके लिए भी एक दिन यादगार के रूप में मनाया जाता है. ये दिन उनकी जिंदगी में नयापन भर सकता है पर इस बात को सोचने के लिए किसी के पास भी समय नहीं है, 
पर मेरा सलाम उन नारियों के लिए जो इस बात की मोहताज कतई भी नहीं है की उनके कार्य के लिए किसी उन्हें किसी पुरस्कार से या सम्मान से नवाजा जाये. पर ये हमारा कर्तव्य है की हम उनकी अहमियत समझे और उन्हें विशेष स्थान दें.




सोमवार, 8 मार्च 2010

कहानी .........नारी -4

महिला दिवस पर..... एक बात अनकही सी


मेरा नाम क्या है---?

कुछ समय पहले मै अपनी परचित के गृह नगर गई थी किसी विवाह में शामिल होने जो की एक छोटा सा शहर है.
विवाह के लिए खरीदारी के लिए वे भी मुझे बाजार ले गए, बाजार में जब सामान खरीद रहे थे तो दूर से कानों में स्पीकर का शोर सुनाई दिया, धीरे-धीरे शोर पास आता गयापहले तो स्पीकर पर क्या बोला जा रहा है उस पर ध्यान ही नहीं दिया, छोटे शहरों में अक्सर पिक्चर का प्रसारण लाउड- स्पीकर पर होता हैपिक्चर के प्रसारण में गाने अवश्य बजाये जाते हैं अतः पहले तो यही लगा, पर जब गाने की आवाज नहीं सुनाई दी तो थोड़ा पास आने पर स्पीकर पर बोलने वाले के केवल शब्द ही सुनाई दे रहे थेस्पीकर वाला जब और पास आया तो उसके बोले शब्दों पर कान लगाया तो पता चला की वह किसी की मृत्यु की सूचना दे रहा थाकिसी महिला की मृत्यु की सूचना थी -जो इस प्रकार थी--" अमन और सोनू की दादी................. और महेश श्रीवास्तव की माताजी............, दिनेश रुपेश की चाची............ तथा स्वर्गीय बाबूलाल श्रीवास्तव की पत्नि................ का निधन हो गया है, जिनकी अन्तिमयात्रा उनके निवास स्थान कमल भवन, अनूप नगर कालोनी से शाम बजे निकली जाएगी.........."।
इस पूरे प्रसारण में दिवंगत महिला का कही भी नाम नहीं था

आज जब हम विश्व महिला दिवस मना रहे हैं तो ये भी एक सच जो आज का जिन्दा सच है इस के विषय में भी जान लें........................





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