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मंगलवार, 8 मार्च 2011

..बात एक अनकही सी -9......... (8 march महिला दिवस)

ये भी हक़दार है सम्मान की.....................

फिर से एक और साल का एक और दिन और नारी के नाम ८ मार्च विश्व महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है. पत्र- परिकाओं में, इन्टरनेट पर  इस दिन के लिए महिलाओं की जोरदार पैरवी होगी. प्रसिद्ध  महिलाओं को सम्मानों से तथा पुरुस्कारों से नवाजा जायेगा, उनके लिए समारोहों का आयोजन होगा और फिर इस दिन को एक और आने वाले साल के लिए इसी दिन को पुन: मनाने के लिए जिस संदूक से निकला जाता है वहीं रख दिया जाता है, ताकि सालभर का गर्द-गुबार उस पर जमती रहे और हम इस दिन को भुलाकर फिर अपनी दुनिया में खो जायेंगे. 



नारी के लिए ये एक दिन नदी की उपरी सतह पर बहने वाली तीव्र धारा की तरह है परन्तु नदी की तलहटी में भी ख़ामोशी से भी  निरंतर बहने वाली धारा है , ठीक उन खामोश नारियों की तरह जो खेत-खलिहानों, घरों में , कारखानों में पूरी दुनिया में एक आम नारी साल भर निरंतर अपने दायित्व का निर्वाह करती है इस बात से अनजान की उनके लिए भी एक दिन यादगार के रूप में मनाया जाता है. ये दिन उनकी जिंदगी में नयापन भर सकता है पर इस बात को सोचने के लिए किसी के पास भी समय नहीं है, 
पर मेरा सलाम उन नारियों के लिए जो इस बात की मोहताज कतई भी नहीं है की उनके कार्य के लिए किसी उन्हें किसी पुरस्कार से या सम्मान से नवाजा जाये. पर ये हमारा कर्तव्य है की हम उनकी अहमियत समझे और उन्हें विशेष स्थान दें.




शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

लघु कथा-2.......... (प्रकृति का न्याय)

प्रकृति का न्याय -- एक अपढ़ ग्रामिण की मौलिक सोच




बस से एक बार सफ़र के दौरान एक ग्रामिण जो निश्चित ही अपढ़ था, की बातों ने सोचने पर विवश कर दियाबस में पीछे की सीट पर - ग्रामिण बैठे थे और फसल और मौसम के बारे में बातें कर रहे थेएक ग्रामिण ने कहा, ' गेहूं की फसल खेत में पक चुकी है और रात में पानी गिर गया, फसल कहीं ख़राब हो जाये?' इस पर दूसरा किसान बोल पड़ा, " अरे अब तो मौसम की कभी भी पता नहीं चलता कब बारिश हो जाती है और कब ठण्ड बढ़ जाती है, फसल का तो अब कोई ठिकाना नहीं रहा।"
इसी तरह के वार्तालाप के बीच में जो एक बात सुनाई दी उसने एक अपढ़ ग्रामिण की सच से मेरा परिचय पहली बार हुआ जिसने ये सोचने पर विवश कर दिया की अपने आप को तथाकथित शिक्षित और प्रज्ञावान मानने वाले हम लोगों से उस अपढ़ ग्रामिण की सोच अधिक उन्नत व तथ्यपरक थी, वह अपने साथियों से कह रहा था, ' अरे! प्रकृति के संग अगर हम खिलवाड़ करते रहेंगे तो क्या वो हमें माफ़ करती रहेगी, हम उससे लेते ही रहते हैं, बदले में कभी लौटाने की नहीं सोचते, ये उसी का नतीजा है की अब उसने जाता दिया है की वो और खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करेगी, उसकी सहनशक्ति ख़त्म हो चुकी है, अगर हम अभी भी नही सम्हले तो वो हमें सबक सिखाएगी, ये उसने जाताना भी शुरू कर दिया है."

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