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गुरुवार, 28 सितंबर 2017

लघु कथा---10



माँ का दिल



नये साल की वह पहली सुबह जैसे बर्फ की चादर ओढ़े ही उठी थी. 10 बज चुके थे पर सूर्यदेव अब तक धुंध की रजाई ताने सो रहे थे. अनु ने पूजा की थाली तैयार की और ननद के कमरे में झांक कर कहा," नेहा! प्लीज नोनू सो रहा है ,उसका ध्यान रखना. मैं मंदिर जा कर आती हूँ ।"
शीत लहर के तमाचे खाते और ठिठुरते हुए उसने मंदिर वाले पथ पर पग धरे ही थे कि उसके पैरों को जैसे किसी ने जकड़ लिया. एक खौफनाक मंजर उसके मुँह बाएं खड़ा था. सामने की सड़क  पर 4-5 साल का बच्चा खून से लथपथ पड़ा था. सुबह की इस ठिठुरा देने वाली ठण्ड में सड़क विधवा की सूनी मांग की तरह खाली पड़ी थी. उसने मंदिर की ओर ये सोच के कदम बढ़ाये कि वह इस पचड़े में नहीं पड़े किन्तु उस बच्चे के करीब से निकलते हुए उसके मन में हूक सी उठी. “ न जाने किस माँ का लाल है...? कहाँ होगी वह...? क्या उसे अपने लाड़ले का ख्याल नहीं आया होगा...?” जैसे सवाल उसके मन में उठ रहे थे. वह जैसे ही थोड़ा आगे बढ़ी तो उसके पैरों को जैसे किसी ने जकड़ लिया, उसके मन में एकदम अपने बेटे नानू का ख्याल हो आया और उसने पलट कर उस बच्चे को देखा तो उससे रहा नहीं गया और वह दौड़कर उस बच्चे के पास जाकर बैठ गई, उसके हाथ में पूजा की थाली थी जिसे उसने वहीँ ज़मीन पर रख दिया और धीरे से बच्चे पर झुकी तो उसने पाया कि बच्चे की सांस चल रही थी. उसने तुरंत ही निर्णय लिया और उस बच्चे को गोद में उठाकर दौड़ लगाईं. उसे पता था कि 3 ब्लाक छोड़कर डॉ. सोनी रहते हैं, उनके घर पहुँचकर उसने तबातोड़ घंटी बजाई. डॉ. सोनी आज थोड़ा देर से सोकर उठे थे पर घंटी की आवाज से समझ नहीं पाए कि कौन हो सकता है...? दरवाजे पर वे अनु तो देखकर थोड़ा अचरज में पड़ गए. उसकी गोद में घायल  बच्चे को देखकर वो तुरंत सारा मांजरा समझ गए और जल्दी से अन्दर से कार की चाबी लेकर आये और कार सिटी हॉस्पिटल की ओर दौड़ा दी. बच्चे को ओ.टी. में ले जाकर उसका तुरंत ट्रीटमेंट शुरू कर दिया गया, और इसी दौरान पुलिस ने भी मामला दर्ज कर लिया. इतना सब होतो-होते 12 बज चुके थे. बच्चे को सुरक्षित हाथों में जान अनु ने चैन की सांस ली और अब उसे घर की याद सताने लगी. डॉ. सोनी ने उसे घर भेज दिया और उसका मोबाइल नं. ले लिया ताकि उसे बच्चे का हाल-चाल बता सकें. 2-3 बजे के करीब अनु को डॉ. का फोन आया और उन्होंने बताया कि उस बच्चे की माँ मिल गई है. जोकि अपने बच्चे के साथ बस से अगले शहर में अपने मायके जा रही थी, रास्ते में कब उसकी नींद लग गई उसे पता ही नहीं चल और वो बच्चा खिड़की खुली होने के कारण उससे बाहर झांक रहा था और इसी दौरान वह उस खिड़की से बाहर अधिक झुक गया था और सड़क पर गिर गया था जिससे उसे काफी चोटें आईं थीं पर वह अब खतरे के बाहर था. कहना नहीं होगा कि वह महिला और अनु स्नेह बंधन के ऐसे सेतु से जुड़ गए थे जो कभी भी टूटने वाला नहीं था, ये एक माँ से माँ का रिश्ता था.

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

लघु कथा-2.......... (प्रकृति का न्याय)

प्रकृति का न्याय -- एक अपढ़ ग्रामिण की मौलिक सोच




बस से एक बार सफ़र के दौरान एक ग्रामिण जो निश्चित ही अपढ़ था, की बातों ने सोचने पर विवश कर दियाबस में पीछे की सीट पर - ग्रामिण बैठे थे और फसल और मौसम के बारे में बातें कर रहे थेएक ग्रामिण ने कहा, ' गेहूं की फसल खेत में पक चुकी है और रात में पानी गिर गया, फसल कहीं ख़राब हो जाये?' इस पर दूसरा किसान बोल पड़ा, " अरे अब तो मौसम की कभी भी पता नहीं चलता कब बारिश हो जाती है और कब ठण्ड बढ़ जाती है, फसल का तो अब कोई ठिकाना नहीं रहा।"
इसी तरह के वार्तालाप के बीच में जो एक बात सुनाई दी उसने एक अपढ़ ग्रामिण की सच से मेरा परिचय पहली बार हुआ जिसने ये सोचने पर विवश कर दिया की अपने आप को तथाकथित शिक्षित और प्रज्ञावान मानने वाले हम लोगों से उस अपढ़ ग्रामिण की सोच अधिक उन्नत व तथ्यपरक थी, वह अपने साथियों से कह रहा था, ' अरे! प्रकृति के संग अगर हम खिलवाड़ करते रहेंगे तो क्या वो हमें माफ़ करती रहेगी, हम उससे लेते ही रहते हैं, बदले में कभी लौटाने की नहीं सोचते, ये उसी का नतीजा है की अब उसने जाता दिया है की वो और खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करेगी, उसकी सहनशक्ति ख़त्म हो चुकी है, अगर हम अभी भी नही सम्हले तो वो हमें सबक सिखाएगी, ये उसने जाताना भी शुरू कर दिया है."

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