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शनिवार, 20 अगस्त 2016

kavita

दस बजे..........








खामोश है,
शहर की हवा;
धुंए का गुबार सा उठा है;
कोनो-कोनो में.
सायरन की आवाज
चीख़-चीख़ कर रुक जाती है.
सड़क  और गलियों में
 आज सन्नाटे का डेरा है.
केवल;
एम्बुलेंस के दौड़ने
और
 पुलिस-सिटी की आवाज है.
यह
कुछ पलों की नहीं;
कोई
घंटा भर
 पहले की ही बात थी,
जब
सब ओर
लोगों की रेल-पेल थी.
रोज की तरह
 घर से
कोई  ऑफिस जाने को/
दुकान खोलने को/
स्कूल जाने को/
दूध लेन को/..............
किसी न किसी काम  से
घर से निकला था.
रोज की तरह कोई
बस पकड़ रहा था,
कोई मेट्रो की राह था.
पर......
दस बजे के आसपास
जब
भीड़ का उफान था,
शहर के
उसी व्यस्त चोराहे पर;
लगातार ब्लास्ट के धमाकों  ने
सब ओर
सन्नाटा दौड़ा दिया था.
अब;
न किसी कार/बस/मेट्रो
की विसिल सुनाई दे रही थी.
सब ओर;
केवल
 सिसकियों/ कराहों/ आहों का आर्तनाद था.
खून से सने चेहरे,
लहू से लथपथ शरीर;
यहाँ-वहाँ छितरे थे.
चौराहे पर लगी घड़ी में,
अभी भी
सुबह के दस बज रहे थे.

बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

कविता-.......................13

रोटी:एक यक्ष प्रश्न  

एक ख्वाब देखा था
         रोटी का.
दुनिया ने जब
आँखें खोलने का मौका दिया;
तब
सुलगता सा प्रश्न देखा
          रोटी का.
समाज के वर्गों सा
मैंने;
आकर बदलता देखा
         रोटी का.
अमीर की डायनिंग टेबल पर
सोने की थाली में सजी रोटी;
पर
गरीब के
हाथ में है प्रश्न बिलखता
             रोटी का.
शामिल हुआ जब मै
दौड़ में जिंदगी की;
तब
सुरसा सा
सामने आया प्रश्न कमाना
             रोटी का.
स्वप्न सब हवा हुए
चक्रवात में रोटी के,
कोलतार की गर्म सड़क पर;
स्वयं को घसीटता
अब
मै स्वयं सुलग रहा हूँ,
तवे की झुलसी हुई रोटी सा.  




वीणा सेठी.

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

यादें..........1

केले का छिलका----


" अरे बुड्ढ़े! पागल है साला, रोज आकर केले के छिलके समेटता रहता है। " मेरे कानों को इन शब्दों के साथ ही कुछ हँसने के स्वर भी सुने दिएमैंने घूमकर देखा कुछ लोग एक ७० साल के बुजुर्ग पर हंस रहे केमै फ्रूट मार्केट में फ्रूट खरीदने आई थीवह बुजुर्गवार सड़क पर पड़े केले के छिलके उठाकर  सड़क के किनारे कर रहे थे, लोगों की हंसी उनके कम में कोई व्यवधान नहीं डाल रही थी, निर्लिप्त भाव से वे अपना कम कर रहे थेजिस ठेले से मै फल ले रही थी पूछने पर उसने बड़े ही दुखी स्वर में बताया कि कुछ साल पहले ऐसे ही किसी के सड़क पर डाले केले के छिलके ने उनके इकलौते बेटे की जान ले ली थी और तबसे ही ये ऐसे सड़क पर पड़े केले के छिलके उठाकर सड़क के किनारे कर देते हैं।
कहना नहीं होगा की उस दिन के बाद जब भी किसी भी रह से गुजरना होता है तो आँखें केले का छिलका ढूंढने निकल पड़ती हैं और कहीं पड़ा दिख जाता है तो अनायास ही पैर की एक ठोकर से उसे सड़क के किनारे कर देती हूँ पर चोर नजरों से ये भी देखती रहती हूँ कोई देख तो नहीं रहा, शायद ये मन का चोर है की कहीं हँसी का पात्र न बन जाऊं ...........पर ये याद रखने की कोशिश अवश्य करती हूँ की कहीं कोई और किसी केले के छिलके का शिकार ना हो जाये??.................






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