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सोमवार, 5 अप्रैल 2010

कहानी..........नारी-5(ममता)

वह भी ममता से भरी थी..................

वह उम्रदराज हो चली थीउसने विवाह नहीं किया था, यही लोगों के लिए कौतुहल का विषय थालोगों के लिए वह अक्सर चर्चा का विषय हो जाया करती थीउसमे कोई कमी नहीं थीवह सुन्दर थी, काफी पढ़ी -लिखी थी और अमीर परिवार की थी, ये बहुत कम लोग जानते थे की उसने जिदगी में काफी उच्चे लक्ष्य अपने लिए निर्धारित किये थे पर उसकी बात को उसके माता-पिता समझने के लिए तैयार ही नहीं थे नतीजा इस रस्साकशी में उसके सपने भी टूट गए और वह उम्र में इतनी आगे निकल गई की उसकी शादी भी हो सकीउसे बच्चों से बहुत प्यार था पर उसकी भावना को कोई समझ नहीं सका, उस दिन वह एक स्कूल के करीब से निकली तो गेट पर खड़े एक साल के बच्चे को रोते हुए देखा तो वह उसे चुप कराने लगी इतने में उस बच्चे की माँ गई और उसने हल्ला मचा दिया और इस तरह चिल्लाने लगी मानो वह उसके बच्चे को चुरा के ले जा रही हो और 'वह' अपराधी मन ली गई, गर कोई उसकी आँखों में झांक सकता तो पाता की उसकी आँखें नाम थी और पूछ रही थी मानो मेरा अपराध क्या था- गर उसका विवाह नही हुआ तो क्या उसमे ममता नहीं थी-------------- उसकी आँखें मानो कह रही थीं की हर औरत में ममता कुदरत की तरफ से भरी होती है उसके लिए तो माँ बनना जरुरी है और ही शादी ------------------..





बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

यादें..........1

केले का छिलका----


" अरे बुड्ढ़े! पागल है साला, रोज आकर केले के छिलके समेटता रहता है। " मेरे कानों को इन शब्दों के साथ ही कुछ हँसने के स्वर भी सुने दिएमैंने घूमकर देखा कुछ लोग एक ७० साल के बुजुर्ग पर हंस रहे केमै फ्रूट मार्केट में फ्रूट खरीदने आई थीवह बुजुर्गवार सड़क पर पड़े केले के छिलके उठाकर  सड़क के किनारे कर रहे थे, लोगों की हंसी उनके कम में कोई व्यवधान नहीं डाल रही थी, निर्लिप्त भाव से वे अपना कम कर रहे थेजिस ठेले से मै फल ले रही थी पूछने पर उसने बड़े ही दुखी स्वर में बताया कि कुछ साल पहले ऐसे ही किसी के सड़क पर डाले केले के छिलके ने उनके इकलौते बेटे की जान ले ली थी और तबसे ही ये ऐसे सड़क पर पड़े केले के छिलके उठाकर सड़क के किनारे कर देते हैं।
कहना नहीं होगा की उस दिन के बाद जब भी किसी भी रह से गुजरना होता है तो आँखें केले का छिलका ढूंढने निकल पड़ती हैं और कहीं पड़ा दिख जाता है तो अनायास ही पैर की एक ठोकर से उसे सड़क के किनारे कर देती हूँ पर चोर नजरों से ये भी देखती रहती हूँ कोई देख तो नहीं रहा, शायद ये मन का चोर है की कहीं हँसी का पात्र न बन जाऊं ...........पर ये याद रखने की कोशिश अवश्य करती हूँ की कहीं कोई और किसी केले के छिलके का शिकार ना हो जाये??.................






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