गुरुवार, 29 अक्तूबर 2015

मुक्तक


मुक्तक 


बेहद उदास शाम है आज;
कोई भी साथ नहीं है आज.
चलो इतना तो करते हैं;
खुद के ही साथ हो ले आज.
(वीणा)

 2 
 जिंदगी के नये रंग;
नई उम्मीद के संग.
लबों पर ले आएँगे;
मुस्कान की एक तरंग.
(वीणा )

1 टिप्पणी:


  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (30.10.2015) को "आलस्य और सफलता "(चर्चा अंक-2145) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

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