गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

.......मेरी कहानी .2

कहानी बबली की .


महेंद्र द्वारा प्रायोजित incredible stories ने यादों के कई झरोखे एक साथ खोल दिए. यात्रा में कोई ऐसी अविश्वसनीय बात जो की अनोखी हो और जो आपके जीवन को प्रभावित करे उसे दूसरों के साथ बाटना ही शायद इस प्रतियोगिता का उद्देश्य है. एक ऐसी ही बात बेहतर कहें तो एक कहानी है जो शायद इसी दिन के लिए मैंने सहेज कर रखी थी.जीवन स्वयं में एक यात्रा है और इस सफ़र के दौरान हमसे कई लोग मिलते हैं जो अपनी छाप छोड़ जाते  हैं कई पात्र तो इतने अविश्वसनीय ढंग से मिलते हैं और ऐसा  काम कर जाते हैं कि लगता है कि क्या वाकई ये उस व्यक्ति का किया है इस बात पर विश्वास करना मुश्किल होता है. बबली भी जीवन के सफ़र में मिली थी और उसके काम पर आज भी विश्वास करने को जी नहीं चाहता.

बात कोई साल भर पुरानी है और आज भी मेरे जेहन में ताजा है, ये बात इसलिए भी और अधिक याद आती है क्योंकि इसी तरह की एक कहानी एक टी.वी. चेनल पर दिखाई जा रही है. ये नारी के अस्तित्व और उसकी अस्मिता से जुडी कहानी  है. ये कहानी बबली की है. बबली हमारे घर सफाई का काम करती थी. उसकी उम्र लगभग २८-३० साल थी और वह ३ बच्चों की माँ थी. हमारी पहले वाली बाई काम छोड़ के जा चुकी थी और दूसरी की तलाश में एक दिन घर के सामने से जाती हुई एक काम वाली बाई को हम ने देखा और उसे बहुत दिनों से देखते आ रहे थे क्योंकि वो ३-४ घर छोड़ कर एक मकान में काम करती थी, छोटे से कद की थोड़ी गोल-मटोल सी दिखने वाली, उसकी साड़ी का पल्लू लपेटने का ढंग उसे और काम वाली बाईयों से अलग करता था. वो साड़ी का पल्लू सीधा लेकर उसे अपने शरीर के चारों ओर कसकर लपेट कर चलती थी, यही कारण था कि  दूर से ही समझ आ जाता था कि बबली आ रही है.

मैंने उसे कई दिनों से आते जाते देख रही थी और मुझे अनुमान हो चुका था कि वह सुबह कितने बजे निकलती है अतः मैंने उसके समय को देखते हुए सामने वालो सड़क पर नजर दौड़ाई तो वह मेरे अनुमान के अनुसार दूर से आती हुई मुझे दिखाई दी. जब वो सामने से निकलने  लगी  तो उसे आवाज  देकर पास बुलाया और पूछा कि' क्या वह काम करेगी? तिस पर उसने कहा कि सोच कर जवाब दूंगी और वह आगे चल दी. मुझे लगा कि वह एकदम से हाँ  कर देगी. दिखने में वह सीधी लगती थी पर अब लग रहा था कि नहीं वो इतनी आसानी से हाँ नहीं करने वाली. दूसरे दिन मैंने फिर उससे पूछा. तब उसने कहा कि वह एक तारीख से काम करेगी.
आखिर एक तारीख भी आ गई और पहले दिन जब वो काम करने आई तो मैंने उससे उसका नाम पूछा, तो उसने अपना नाम बबली बताया.

बबली  को पहले ही दिन अपने काम का ढंग समझा दिया था और उससे कह दिया था कि वह काम सफाई से करे. बर्तन तो उसने अच्छे साफ़ किये और जब झाड़ू-पौछे का समय आया तो झाड़ू लगते लगते उसकी सांस फूलने लगी. लगने लगा कि वह सफाई का काम नहीं कर पायेगी. खैर-खैर करते उसने झाड़ू-पौछे का काम निपटाया.और इस काम से उसने पहले ही दिन हाथ खड़े कर लिए. स्वभाव से वह अच्छे घर की लग रही थी, सो उसने जब सफाई के काम करने में अपनी असमर्थता दिखाई तो उससे केवल बर्तन साफ़ करवाने का काम ही करवाना पड़ा. उसने सफाई के काम की परेशानी दूसरी  बाई लाकर दूर कर दी.

इसी तरह ३-४ महीने बीत चले और धीरे-धीरे बबली के विषय में भी उसी के द्वारा सब पता चलने लगा कि उसके ३ बच्चे हैं, दो बेटे और एक बेटी . उसका पति बेहद शक्की मिजाज का था और उसने अपने पति से पूछा था कि वह हमारे यहाँ काम कर ले तो उसने न ही हाँ कहा था और न ही ना, पर एक दिन वो जब काम पर आई तो उसने कहा कि वह अगले महीने से काम पर नहीं आएगी क्योंकि इसके आदमी ने  काम करने से मना कर दिया है. तब मैंने उससे  पूछा कि  इतने समय से उसने मना क्यों नहीं किया, तब वह बोली कि मैंने उससे पूछा था तब वो कुछ नहीं बोला था तो मैंने समझा कि उसकी हाँ है. उसने बताया कि वह कल उसके घर से काम पर निकलने के बाद उसका पीछा करते हुए हमारे घर तक आया था और वो जितने देर तक हमारे घर काम करती रही उतनी देर वह चौरस्ते  कि एक दुकान पर बैठ कर  उसके बाहर निकलने का इंतज़ार करता रहा. उसने बताया कि वह अक्सर उसका पीछा करता है कि वो काम के अलावा कही और तो नहीं जाती. उसका पति इस हद तक शक्की था कि यदि वह पड़ोस में रहने वाली महिला से भी बात करती तो उसका पति यही शक करता कि वह पडोसी के पति से बात करती है. ऐसे पति के साथ उसे रहते हुए १५-१६ साल हो चले थे.

एक दिन अचानक उसके माथे पर मेरा ध्यान गया तो वहां पर एक चोट का लम्बा निशान देखकर मुझसे रहा न  गया और मैंने पूछ ही लिया कि उसे यह चोट कैसे लगी, इस पर उसने बताया कि पिछली होली पर उसकी बुआ का लड़का उसे और उसके पति को रंग लगाने आया था तब उसके बुआ के लड़के याने उसके भाई ने उसे टिका लगाकर पाँव छुए और थोडा सा रंग उसके गाल पर भी लगा दिया था, तब उसके पति ने कुछ भी नहीं कहा पर वह जिस तरह से उसे कहर भरी नज़रों से देख रहा था, उसका दिल किसी अनहोनी आशंका से  काँप उठा था, और उसकी आशंका शाम होते-होते सच में बदल गई. शाम के समय वो पी कर आ गया और नशे में उसने उसे सुबह के लिए पहले तो बहुत बुरा भला कहा और भाई-बहन के रिश्ते को गाली दी जो बबली को सहन नहीं हुआ तो उसने पलट कर जवाब दिया तो पति का क्रोध सातवें आसमान पर चला गया और उसने आव देखा न ताव और पास पड़ी लोहे की रोड बबली के सर पर दे मारी जो उसके आँख के उपर माथे पर जाकर लगी और खून की धरा फूट पड़ी. खून देखकर पति के होश उड़ गए और बबली को चक्कर आने लगे चोट लगने से वो बेहोश होकर घर के आँगन में गिर पड़ी. उसके पति का नशा काफूर हो चुका था उसे लगा चोट से बबली मर गई है और वो उसे जोर-जोर से पुकार कर हिलाने लगा- जब उसे लगा कि वह केवल बेहोश है तो उसे चैन आया, काफी लोग इकट्ठे हो गये थे बबली कि सास अपने बेटे को कोसने लगे वे अपने बेटे के शक्की स्वभाव से परेशान थी. गाँव में अमूमन शाम या रात के समय डॉक्टर का मिलना लगभग नामुमकिन सा होता है और वो भी त्यौहार के दिन. खून बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा था और कोई नीम-हकीम भी नहीं मिल रहा था जो इलाज करता. उसकी सास ने उसकी बेहोशी में ही कपडा जलाकर उसकी राख बहते खून वाले घाव पर लगा दी, रोड लगने से माथे पर छोटा  सा गड्ढा सा हो गया था जिस पर स्टिचिंग जरुरी थी, जैसे तैसे ३-४ घंटो के बाद उसका खून बहना बंद हुआ और वो बाहर आँगन में ही पड़ी रही. जब वह होश में आई तो धीरे  धीरे खुद ही उठकर खड़ी हुई और जैसे तैसे घर के अन्दर अपनी खटिया पर जाकर लेटी और एक बार फिर से वो बेहोश हो गई.  दूसरे ही दिन कहीं जाकर उसे चिकित्सा मिल सकी.पर एक बात अच्छी हुई कि उस दिन के बाद से उसके पति ने शराब छोड़ दी पूरे गावं में उसे बहुत लानत दी. उसके बाद उसके पति ने गावं भी छोड़ दिया.

 बबली ने जब से काम छोड़ने की बात की तब से नई बाई को ढूंढने की कवायद शुरू करनी पड़ी, अभी एक तारीख में भी १०-१२ दिन बाकि थे पर दूसरे दिन बबली कम पर नहीं आई तो लगने लगा वो काम छोड़ कर चली गई. अतः जिस घर में वो काम करती थी वहां पर पता किया  तो वो वहां पर भी काम करने नहीं आई थी. खैर उसके बाद बबली काफी दिन तक नहीं दिखाई दी और हमने भी दूसरी बाई लगा ली, करीब २-३ महीने बाद एक दिन जब मै गेट पर खड़ी थी तब सड़क पर दूर मेरी निगाह गई तो देखा बबली जैसी दिखने वाली एक बाई चली आ रही थी, चूँकि बबली डील-डौल में थोड़ी मोटी थी पर उसके पल्लू लपेटने के ढंग से वह दूर से ही पचनी जाती थी अतः थोडा शक हुआ पर जैसे ही वो पास आई तो वास्तव में ही वो बबली थी. पहले से काफी दुबली हो गई थी और मुश्किल से ही पहचान में आ रही थी. मुझे गेट पर खड़ा देखकर वो ठिठकी और थोड़ा हिचकिचाई, मैंने उसे आवाज देकर बुलाया. वो पास आई तो मैंने उसे घर के अंदर आने को कहा. वो झिझकती हुई अंदर दाखिल हुई और मेरे कुछ कहने से पहले ही बोल पड़ी," दीदी! आप सोच रहे होगे कि बबली कामचोर निकली और पैसे एडवांस लेकर घर बैठ गई...............!!".  मेरे नहीं कहने पर और ये पूछने पर कि वो इतने दिन कहाँ थी, इस पर उसने जो बताया उस पर आज भी विश्वास करने को मन नहीं करता पर उसका सुना माथा अपनी कहानी स्वयं कह रहा था. उसने बताया कि वो जिस दिन हमारे घर से सुबह  का काम करके बाजू वाले घर में काम करने गई तो उसकी तबियत अचानक ख़राब हो गई और वो घर चली गई, प्रायः उसका पति उसके काम करने से पहले ही सुबह काम पर निकल जाया करता था और वो बच्चों को स्कूल भेजकर खुद काम पर निकल जाया करती थी, घर के ताले की एक चाबी उसके पास व एक पति के पास रहा करती थी. उस दिन वो घर पर जब पहुची तो उसे घर का ताला खुला मिला उसे आश्चर्य हुआ कि इस घर में कौन हो सकता है, उसका मन किसी आशंका से काँप उठा.उसे लगा घर में कोई चोर घुस आया, ये सोच के उसकी घर में घुसने की हिम्मत नहीं हो रही थी फिर भी वो धीरे-धीरे कांपते क़दमों से घर के अंदर दाखिल हुई, उसने अपने हाथ में एक डंडी पकड़ रखी थी शायद जरुरत न पद जाये.........उसके घर में २ कमरे थे और पीछे एक छोटा सा आँगन और उसके साथ लगा छोटा सा किचिन .

जब वो धीरे से कमरे में घुसी तो पहले कमरे में कोई नहीं था. दूसरे कमरे से किसी की दबी सी चीख सुनाई दी तो उसके कदम दूसरे कमरे की तरफ बढ़ चले, दूसरे कमरे में वो जैसे सी घुसने लगी तो दरवाजे का पल्ला पकड़ कर ठिठक गई. वो दरवाजे पर ही भौचक्की सी खड़ी रह गई थी. कमरे में बिस्तर पर उसका पति किसी लड़की के उपर झुका हुआ था उसका एक हाथ लड़की के सीने पर उसके उभारों पर रखा था और दूसरे हाथ से वो लड़की के मुँह को दबाने का प्रयास कर रहा  था, लड़की अपने आप को छुड़ाने की कोशिश में हाथ-पाँव पटक रही थी, अचानक लड़की के मुँह से हाथ हट गया और लड़की जोर से चालली," पापा नहीं! ये क्या कर रहे हो......." और बबली सकते में आ गई. उसका पति अपनी ही बेटी के साथ ये के कर रहा है १०-१२ साल की बच्ची अपने बाप की हवस का शिकार होने जा रही थी. बदहवास बबली को सुछ सूझ नहीं रहा था वो अपनी बेटी को बचने दौड़ी........ पर जैसे ही उसने अपने पति से बेटी को छुड़ाना चाह उसके पति ने "हट साली मादर.......! कहकर उसे परे झटक दिया. बबली तड़प गई,'बिल्लो के पापा (बेटी  का नाम) ये क्या कर रहे हो..........?". उसका पति बेहद  नशे  में था और नशे में कुछ अधिक ही जोश और ताकत आ गई थी, जैसे ही उसने बबली को झटक कर परे फेका उसका सिर दीवार से टकराया, वो जल्दी से उठी और अपनी बेटी को बचने के लिए फिर से झपटी पर  उसका प्रयास विफल गया, उसे कुछ नहीं सूझ रहा था वो अचानक किचिन में जाकर सब्जी काटने वाला हँसिया उठा लाई. अपने पति को ललकार कर कहा कि बेटी को छोड़ दे अन्यथा अनर्थ हो जायेगा पर पति तो नशे में कामान्ध हो चुका था, उस पर बबली कि बात का कोई  असर नहीं हुआ वो एक बार फिर अपनी बेटी कि तरफ लपका ही था कि बबली ने हंसिये से उस पर वार कर दिया जो सीधा उसकी गर्दन पर जाकर लगा, उसका पति जमीन पर गिर गया था और उसकी गरदन पर लगभग कट चुकी थी. बबली कि आँखे  आश्चर्य से खुली कि खुली रह गई थी उसके बाल लगभग बिखरे हुए थे, ऐसा लग रहा था मनो वह काली का अवतार बन चुकी थी.अपनी बेटी को बबली ने अपने पति से नहीं बल्कि एक नराधम से बचाया था और सुके लिए वह कुछ समय के लिए चंडी बनी तो क्या आश्चर्य था!
उसके बाद कि कहानी के विषय में कहने को कुछ नहीं खांस नहीं है. बबली पति हन्ता कहलाई और समाज ने उसे धिक्कारा पर किसी ने उसकी तारीफ नहीं की कि उसने नारी होकर एक नारी कि गरिमा को बचाया, जब तक वह अपने शक्की पति से मार खाती रही किसी को उसके विषय में कुछ सोचने कि जरुरत नहीं  महसूस हुई और जब उसने अपनी वास्तविक शक्ति को पहचान कर उसका उपयोग किया तो वह इस तथाकथित समाज के लिए अछूत हो गई. मैंने उससे जब पूछा कि आजकल वह क्या कर रही है तो उसने बताया की जिन घरों में वो काम करती थी उसके दरवाजे उसके लिए बंद हो गए हैं. उसकी आँखों में आंसू थे, " उसने मुझसे  प्रश्न किया की,"बताओ दीदी! इस सब में मेरा और मेरे बच्चों का क्या कसूर है ...........अपनी बेटी को एक राक्षस से बचा कर मैंने क्या गलत किया और मेरे बच्चों ने क्या गुनाह किया है....? कि उन्हें आज हर जगह तिरस्कार मिल रहा है................ मेरे बच्चों का स्कूल छूट गया है और खाने के भी लाले पड़ गए हैं.............. मायके और ससुराल दोनों जगह मेरी कोई सुनवाई नहीं ..........मै अपने बच्चों का पेट कैसे भरूँ................" बबली का सवाल केवल मुझसे नहीं वरन पूरे समाज से था.......और उसका उत्तर देना मेरा फर्ज था . कुछ निश्चय कर मैंने बबली से कहा,'बबली कल से काम पर आ जाना.............." उसकी आँखों में मेरे लिए आश्चर्य था. "सच दीदी.....!' मैंने सिर धीरे से सिर हिला दिया. वो ख़ुशी से चहक उठी .आज वो मुझे पहले वाली  बबली लग रही थी.

1 टिप्पणी:

  1. पता नहीं कितनी ही बबली घुट घुट के समाज में जी रहीं या जिन्होंने उठने की कोशिश की दबा दी गयीं... कभी लगता हम बदल रहे, फिर खुद पर ही शक सा होना लगते....
    खैर, काफी अच्छी तरह से उभारी आपने बबली की व्यथा..

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