मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

लघु कथा......6(माँ की ममता)

माँ की ममता केवल इंसान की बपौती नहीं ...

बात कुछ अधिक पुरानी है शायद सालों पुरानी पर जेहन में आज भी ताजा हैहमारा दूधवाला सालों से दूध दे रहा है और आज भी हम उसीसे लेते हैं
दूधवाले को हम गुड्डू भैया कहते हैं, वो इंतना इमानदार है या कहो की इतना बेईमान है की दूध में पानी तो नहीं मिलाता पर भैस के दूध में गाय का दूध मिलकर भैस के प्योर दूध के पैसे वसूलता है और हमने भी उसकी इस बईमानी पर स्वीकृति की मोहर लगा दी है. जब दूध में अधिक मिलावट का अंदेशा होता है तो माँ उसे दूध बंद कर  दूसरा दूध वाला लगवाने की सैकड़ों बार धमकी दे चुकी हैं जिसके कारण कुछ दिन तक दूध बहुत ही अच्छा मिल जाता है
हाँ....... तो बात पुरानी ही है पर आज भी यादों के पन्नों पर उसकी इबारत की चमक फीकी नहीं पड़ी है
एक दिन गुरुवार के दिन ( यहाँ गुरुवार का बाजार लगता है) गुड्डू भैया ने एक भैस खरादी और वो बाजार से उसे घर ले जाने लगे उस भैस ने कुछ दिन पहले ही एक बछड़ा पैदा किया था, समस्या ये थी की भारी भरकम भैस को कैसे - किलोमीटर की  दूरी तय करवाई जायेबाजार में मै सब्जी लेने के दौरान गुड्डू भैया को ये सब करते हुए देख  ही थी तब मैंने उनसे पूछा की वे कैसे भैस को ले जायेंगे ...??
 तो इस पर उन्होंने बताया की। "दीदी! भैस के बच्चे को एक इन्सान मोटर साइकिल पर ले जायेगा और ये भैस अपने बच्छे के पीछे पीछे चलती चली जाएगी।"
 मै उसकी बात सुनकर हँस पड़ी और मेरे दिमाग में यही सवाल था की एक जानवर भला  ऐसे कैसे कर सकता है। 
 गुड्डू भैया मेरी हँसी से ताड़ गया की मै क्या सोच रही हूँतब उसने कहा," अरे दीदी! ये भैस भी तो एक माँ है देखना अपने बच्छे के पीछे कैसी दौड़ी चली आएगी..."। 
 और सच में जैसे ही उसके बच्छे को एक आदमी ने मोटर साइकिल में अपनी गोद में लेकर बैठाया और मोटर साइकिल चली वो उस मोटर साइकिल के पीछे दौड़ लगाने लगी
 ...ये एक माँ की ममता ही तो थी...जो उसे मजबूर कर रही थी की वो अपनी संतान के पीछे जाये.




8 टिप्‍पणियां:

  1. तथ्य से परिपूर्ण लघु कथा।

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  2. सिक्के के दो पहलुओं की उपमा देके कहा जाए तो इस लघु कथा से यह सार भी मिलता है कि एक तरफ़ तो बेशक़ माँ की ममता केवल इंसान की बपौती या माँपौती नहीं पर दूसरे पहलू में इंसान अपनी चतुराई से ममत्व का प्रयोग कर एक मूक प्राणी से अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेता है..इस स्वार्थपरकता पर कहीं न कहीं इंसान का एकछत्र स्वामित्व है :)

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    1. aap ne sahi kaha, ham isnsaan apne matlab ke liye kisi bhi had tak jane ko taiyar ho jate hain chahe fir vo insaniyat ko thokar mar kar hi kyon na karn.

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    2. guddu bhaiya kee sehj budhimata ki bhi serhana karni paregi

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    3. bilkul thik, vastav menn budhimata apna rasta dhundh hi leti hai.

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  3. कोई भी बच्चा माँ से बहुत दूर नहीं रहता और कोई भी माँ अपने बच्चे से दूर कभी नहीं रह पाती
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति

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