शुक्रवार, 31 मई 2013

शब्द-यात्रा--------नदी

---नदी...

सरि
  
नदी के कई नाम हैं...'सरिता, सरी, दरिया..........' अनवरत बहता हुआ स्वच्छ पानी -नदी कहलाता है. पर आजकल के सन्दर्भ में दरिया वो भी साफ़ पानी का थोड़ा मुश्किल है. नदी बहते हुए कभी शांत तो कभी चंचल हो जाती है. अमूमन दरिया शांत बहने वाली धारा लगती है.ये अपने मूल स्थान से जब निकलती है तो प्रायः पतली धारा ही होती है ठीक किसी नवजात शिशु की तरह. जैसे-जैसे नदी आगे बढ़ती है उसके वेग में परिवर्तन होता जाता है जब पर्वत और पहाड़ों से अपनी यात्रा आरंभ करती है तो उसकी रवानी में युवाओं सी  चपलता आ जाती है. दरिया का जोश देखते ही बनता है. अचानक लगने लगता है मानों दरिया में तूफान आ गया हो. उछल-उछल कर मानों पहाड़ों की उतुंग चोटी को छूना चाहती हो, उसके साहस से ऐसा लगता है मानों वह पत्थरों को चीर के रख देगी. पहाड़ का दमन छोड़कर जब वह पहाड़ी की तलहटी में आसरा पाती है तो उसकी धारा की प्रबलता अपने चरम पर होती है. उसका वेग इतना प्रचंड होता है कि लगता है मानो वह पृथ्वी का सीना चीर कर उसके अन्तः स्थल में ही प्रवेश कर जाएगी.
 पहाड़ी कि तलहटी से आगे की यात्रा में नदी की गति में धीरे-धीरे स्थिरता आने लगती है.यहाँ उसमें चपलता के स्थान पर गंभीरता नजर आने लगती है.नदी मानों व्यस्क हो चली हो और उसे अपने कर्तव्य का भान होने लगा हो.नदी की यात्रा अब मैदानों से होकर गुजरती है, नदी बेहद शांत और कही तो उसकी गति देखकर लगता है मानों वो अपने आसपास की प्रकृति को देखकर ठिठक गई हो और अपनी गति को भूल गई हो. कभी- कभी उसकी गति की आवाज तक नही सुने देती बिलकुल किसी योगी की तरह मौन धारण किये लगती है.
दरिया के दोनों किनारे प्रायः उसके कद से ऊँचे होकर उसको सीमाओं में बांध देते है किसी लक्षम्ण रेखा की तरह, ऐसा लगता है की उसके किनारे उसे अपनी मर्यादा में रहकर बहने  को कह रहे हो, आत्मनुशासन का पाठ नदी को इन्ही किनारों से मिलता है जो की हम इन्सान जानते हुए भी नहीं सीखना चाहते.और.............और नदी आत्मानुशासित होकर समरस भाव से एक सन्यासी की भांति होने लगती है............... और धीरे-धीरे मंथर गति से प्रवाहित होते हुए सागर से मिलने के लिए स्वयं-मुग्धा की तरह चल देती है.

veena sethi.---------------------------------------------------------------------------

सोमवार, 27 मई 2013

कहानी ...जीवन का भोगा यथार्थ

      

पेलियेटीव वार्ड:एक खामोश अन्तिम सफ़र 


 जीवन को एक यात्रा कहा या है और जो समय के साथ साथ आगे बढ़ती जाती है। ये यात्रा हर व्यक्ति को करनी ही है वो चाहे या न चाहे। यह यात्रा कभी कठिनाइयों से भरी होती है तो कभी सुविधाओं की कश्ती पर तैरती है। जीवन की ये यात्रा वास्तव में सुख और दुःख का एक समीकरण है पर ये समीकरण कभी  सन्तुलित नहीं रहता क्योंकि सुख और दुख के लिए कोई निश्चित प्रतिमान नहीं तय किये जा सकते।
 
 
जब भी कभी जीवन में लगता है सब कुछ ठीक चल रहा है अचानक से ही राह चलते बेखबर राही को जिस तरह से ठोकर लगती है और वो कभी-कभी बुरी तरह से लड़खड़ा जाता हैइसी  तरह जिंदगी भी एक ठोकर मार  देती  है और ये ठोकर तो कभी-कभी इतनी मारक होती है कि इंसान हक्का-बक्का रह जाता है और सोचने पर विवश हो जाता है कि जिंदगी इतनी कठोर भी हो सकती है  ....?? ये तब समझ आया जब एक दिन अचानक से दादी के गाल में एक बड़ा सा स्पॉट हो गया और थोड़े दिन बाद वो एक छोटी सी गाँठ  में बदल गया, पहले तो दादी ने कुछ ध्यान नहीं दिया पर एक दिन जब गाल में दर्द हुआ और खून निकला तो वे थोड़ा घबरा गई और पापा को बताया, पापा के फ्रेंड डॉ शर्मा ने दादी का चेक अप किया और पापा को उन्हें भोपाल में दिखाने की सलाह दी। पापा को लगा  की जरुर कुछ बात है, पर शर्मा अंकल ने यही कहा कि एक बार रूटीन चेक अप करवा लेना ही बेहतर है।
 
शर्मा अंकल ने जवाहर लाल नेहरु कैंसर अस्पताल में चेक अप करवाने को कहा और पापा दादी को वहीं लेकर आए। और मुझे तो साथ आना ही था क्योंकि मै दादी की लाड़ली जो हूँ। भोपाल के जवाहर लाल कैंसर अस्पताल में जब हम दादी को लेकर आये तब ये नही पता था कि  एक ऐसी दुनिया से सामना होगा जहाँ कैंसर जैसे शब्द की दहशत ही इन्सान को जिंदगी के एक ऐसे पहलू से सामना करवाता है जिससे आज दुनिया का हर आदमी बचना चाहता है।
 
दादी पापा से बार बार पूछती रहीं ," क्यों रे गब्दू ..! (पापा को दादी प्यार से इसी नाम से बुलाती हैं तब पापा के चहरे पर खिंची लकीरें देखने लायक होती हैं ...) मुझे यहाँ क्यों लेकर आया है ...? "

पापा ने अधिक तो कुछ नहीं कहा, माँ ...! तेरे गाल में चोट लगी है उसे दिखने लायें हैं।
तब दादी से रहा नहीं गया, "पर ...तू मुझे यहाँ क्यों लेकर आया है ...??" पूछकर अपनी शंका जाहिर की।
 
पापा ने दादी को टालते हुए कहा, " यहाँ पर एक दोस्त को देखने आया था, सोचा आपको भी यहीं चेक करवा लेते हैं।"
 
दादी कुछ नहीं बोली।उनका चेक अप हुआ और बिओप्सी करने के बाद रिपोर्ट दो हफ्ते के बाद देने के लिए कहा। हम दादी को लेकर घर आ गए। जैसा की डॉ . शर्मा का अनुमान था दादी के गाल में कैंसर की गाँठ थी और वो दादी को नकली दाँत लगाने के कारण हुआ था। नेहरु अस्पताल के डॉ ने ऑपरेशन की सलाह दी और दादी को अस्पताल में एडमिट कर लिया गया। उसके पहले भी दादी के कई टेस्ट हुए और वे बार बार पूछती रहीं कि  उन्हें  क्या हुआ है, चूँकि उन्हें कुछ भी नहीं बताया  था इसलिए  पापा ने यही कहा कि आपके गाल में  गाँठ है बस एक मामूली से ऑपरेशन से निकाल देंगे। एक दो घंटे की बात है और उसके बाद अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी।
 
डॉ ने दादी को लगभग 10 दिनों तक अस्पताल में भरती रखने के लिए कहा था और इसके लिए प्राइवेट रूम ले लिया गया था। दादी के गाल में जो गाँठ थी उसके लिए डॉ ने सोचा था कि वह पहली स्टेज का कैंसर होगा पर जब ऑपरेट किया तो वह थर्ड स्टेज का था और जो ऑपरेशन 2-3 घंटे चलना था वह लगभग 7 घंटे चला। पापा को जब पता चला तो वे बेहद परेशान थे और उन्हें पहली बार जिंदगी में मैंने फूट -फूट कर रोते देखा। दादी को 80 साल की उम्र में इस हाल में देखकर पूरा घर स्तब्ध रह गया था, दादी जैसी जिंदादिल इन्सान के साथ ऐसा हो जाने की कल्पना भी कोई नहीं कर सकता था।
 
दादी के साथ प्राइवेट रूम में माँ और मै रहे। नेहरु अस्पताल के प्राइवेट वार्ड की कतार के सामने के दरवाजे सामने एक दरवाजा और भी था और उस दरवाजे के उपर एक बोर्ड पर लिखा था "पेलियेटिव वार्ड ".  उसका मतलब न समझ आने पर मैंने एक नर्स से पूछा, तब नर्स ने बताया कि इस वार्ड में ऐसे मरीजों को रखा जाता है जिनका कैंसर आखरी स्टेज पर होता है। उस दरवाजे जब मैंने रूम के अन्दर देखा तो पाया कि वो एक बड़ा सा हॉल था  जिसमें 15-20 बेड थे और ऐसा लग रहा था कि एक भी बेड ख़ाली नहीं था। दरवाजे के बिल्कुल सामने के बेड पर एक 90 साल के बुजुर्ग लगभग नीम बेहोशी की हालत में लेते थे। उनके आसपास बहुत सारे लोग खड़े और बैठे थे।नर्स से जब पूछा नो उसने बताया कि इन बुजुर्ग का नाम सईद मिर्ज़ा था।और वे फेफड़ों के कैंसर की आखरी स्टेज पर थे, कैंसर उनके पूरे शरीर  में फ़ैल चुका था और वे बेहद दर्द के कारण बेहोशी की हालत में भी दर्द से करहा रहे थे। लगभग एक महीने  से वे इस वार्ड में भर्ती  थे, अब तो मार्फीन के इंजेक्शन भी उन्हें दर्द में राहत देने में नाकाम साबित हो रहे थे।मिर्ज़ा साहिब का परिवार काफी बड़ा लगता था, उन्हें हर समय 5-7 लोग घेरे रहते थे और उतने ही बाहर  विजिटर हॉल  में बैठे रहते थे। कुछ के हाथ में कुरान रहती थी और उनके लिए उपर वाले से दुआ मांगते रहते थे और हर एक की आँखों में आँसू साफ़ दिखाई देते थे
उन बुजुर्गवार के दर्द की तड़फ कोई भी महसूस कर सकता था। कोई बीमारी इस कदर खौफ़नाक और जानलेवा हो सकती है,ऐसा तो मैंने सपने में भी अनुमान नहीं लगाया था। वे रह रह कर दर्द से करहा  रहे थे और जब दर्द उनकी बरदाश्त करने की हद से पार हो जाता तो उनके मुँह से यकसा "अब्बा" निकल जाया करता। जिंदगी का सच तो यही है कि  इन्सान किसी भी उम्र में पहुँच जाए, दुख-दर्द में उसे अपने माता-पिता ही याद आते हैं। और वे दर्द में रह-रह कर पुकार उठते थे "अब्बा हजूर". उस आवाज का दर्द आज भी मेरे कानों में गूँज उठता है।
 
आज गुरूवार को दोपहर में उनके इर्द-गिर्द गहमागहमी बढ़ गई थी, मै दादी के  रूम में ही थी, दोपहर का समय था और  सब बैठ के खाना  खा रहे थे, दादी खाना तो नहीं खा सकती थी और उनके लिए लिक्विड डाइट अस्पताल से ही मिलती थी और वो नर्स ही उन्हें देती  थी। मै  खाना तो खा रही थी पर मेरा पूरा ध्यान  बाहर की ओर ही था। अभी मै खाना खा ही रही थी कि  अचानक बाहर की गहमागहमी अचानक ही सन्नाटे में तब्दील हो गया। मैंने सोचा कि क्यों दरवाजा  खोलकर बाहर झांक लूँ.

 दादी ने पूछा," क्या बात ...? बाहर क्यों झांक रही हो ...?"

"
कुछ नहीं दादी ...! मै  जरा पानी लेकर आती हूँ", पानी की बोटल हाथ में लेते हुए मैंने जवाब दिया, और धीरे से दरवाजा बंद करके मै बाहर निकल आई। बाहर एक नर्स से पूछा," क्या हो  गया ...?". नर्स ने बताया कि मिर्जा साहिब चल बसे। मै केवल 'ओह' करके रह गई।
 
मुझे बेहद ख़राब लग रहा था। मिर्जा साहब का परिवार उनके इर्द-गिर्द एकत्रित था, सब बेहद खामोश  थे , माहौल  में सिसकियों की आवाज़ें थी। थोड़ी देर में ही उनका पार्थिव शरीर स्ट्रेचर पर रखा था, धीरे से वो स्ट्रेचर पेलियेटीव वार्ड के बाहर आता दिखाई दिया और उस स्ट्रेचर को घेरे उनका पूरा कुनबा उनके साथ था। शायद उनके उन आखरी लम्हों में जितना साथ चल सकें चलना चाहते थे। कुछ देर तक माहौल बेहद ही खामोश रहा, इस ग़मगीन सन्नाटे को धीरे-धीरे जिंदगी अपनी ओर मोड़ने लगी थी। मै ये सब अपने सामने होते हुए देख रही थी, थोड़ी देर में ही सब पहले जैसी चहल-पहल दिखाई देने लगी थी। उस बेड पर जहाँ कुछ लम्हों पहले मिर्जा साहब जिंदगी से मौत की ख़ामोशी में चले गए थे, पर पड़ी सफ़ेद चादर को उठा दिया गया था और एक बाई उस पर दूसरी धुली सफ़ेद चादर बिछा रही थी , अब लग ही नहीं रहा था कि  अभी थोड़ी देर पहले उस बेड पर किसी ने अपनी अंतिम यात्रा पूरी की है।
 
कुछ पल गुजरे ही होंगे कि  मेरे पीछे के दरवाजे से एक नर्स तेजी से चलती हुई आई और दूसरी नर्स से बोली, " अरे ...! वह मिर्जा साहब वाले बेड की चादर बदल दी है ना, ये बेड अभी एक पेशेंट को एलोट हुआ है।" मेरी निगाहें मिर्जा साहब वाले बेड  से होती हुई दरवाजे के उपर लिखे बोर्ड पर जाकर रुकी, जहाँ पर लिखा था "पेलियेटीव वार्ड".
                                वीणा सेठी,

बुधवार, 15 मई 2013

मेरी शब्द यात्रा ------2

बुराई और अच्छाई के दो शब्द..'कु' और 'सु'.

जीवन के विभिन्न पहलू सिक्के के दो पहलू की तरह ही होते हैंहर पहलू के दो छोर होते हैंजीवन का एक पहलू ख़ुशी है तो दूसरा पहलू ग़म हैऐसे ही दुनिया में अच्छाई के साथ बुराई भी जुडी है, वास्तव में देखा जाये तो किसी एक पहलू का महत्व दूसरे पहलू के बिना अधूरा है या उसका अस्तित्व दूसरे पहलू के मौजूद होने पर ही है

जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू 'अच्छाई' और इससे जुड़ा 'बुराई' है

दुनिया की सारी बुराई 'कु' शब्द से जुड़ी है....................................................
वैसे ही दुनिया की सारी अच्छाई "सु" शब्द से जुड़ी है.................................. ।

बुराई के लिए 'कु' शब्द संज्ञा के साथ जोड़ देने पर वह शब्द बुराई की श्रेणी में जाता है
' कु' शब्द का अर्थ है बुरा
कुविचार- बुरा विचार, कुकृत्य- बुरा काम, कुख्यात- बदनाम, कुगति- बुरी स्थिति , कुचेष्टा- बुरा इरादा , ऐसे ही जाने कितने शब्द हिंदी शब्द कोष मने होंगे जो बुराई का अर्थ व्यक्त करते हैं

'सु' शब्द का अर्थ होता है अच्छा
सुविचार- अच्छा विचार, ऐसे ही सुकाम, सुगति, सुसंस्कार जैसे शब्द अच्छाई को परिभाषित करने वाले है
व्यक्ति अपनी अच्छाई या बुराई से पहचाना जाता है और समाज में अपने लिए सम्मान  या अपमान की का मार्ग प्रशस्त करता है.
---------------------------------वीणा   सेठी -------------------------------------------------------------------------























रविवार, 12 मई 2013

on The MOTHER'S DAY...

माँ तुम्हारा वो एहसास 





 तुम मेरी माँ हो,
मै ये  जानता  हूँ ;
 पहचानता हूँ .. 
 तुमने 
मेरा हाथ  थाम  
चलना सिखलाया था। .
मेरे  कदम 
जब डगमगाए थे;
तुमने 
हाथ बढ़ा थामा था।
जब भी कभी 
मै गिरा 
तुमने 
मुझे उठा 
मेरी सिर 
प्यार से सहलाया था।

आज 
जब तुमने 
अपना हाथ 
मुझे थमाया था,
तुम्हारा वही 
कोमल एहसास 
मुझे सहला गया था।
मुझे मालूम है :
आज मुझे 
तुम्हारा हाथ थामना है;
और 
मुझे भी तुम्हारे  
उसी एहसास को 
फिर से 
एक बार 
 जीना है।
तुमने जो मुझे दिया;
आज मुझे,
मेरी प्यारी माँ ...!
तुमको वो लौटना है।
और ...और ...
तुम्हारी 
वही ममता और स्नेह का 
अमर वरदान 
मुझे फिर से जीना 
और पाना है।

वीणा सेठी ..................................................................................................................................................

  , 

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

मेरी शब्द यात्रा

भय

'भय' मन का एक आवेग है. यह मानव को कमजोर करता है. भय या दर एक नकारात्मक आवेग है. ये दिल में उत्पन्न होकर मस्तिष्क तक फ़ैल जाता है और हृदय में आशंका को जन्म देता है.





आजकल एक पेय पदार्थ के उत्पाद के विज्ञापन में एक वाक्य लगभग जुबान पर चढ़ जाने वाला है, " दर के आगे जीत है ", वाक्य विन्यास कुछ गलत अवश्य है किन्तु एक सन्देश देता है. भावार्थ में यही है कि डर का सामना करने के बाद डर गायब हो जाता है और यही डर पर जीत का डंका बज जाता है.

डर भी दो तरह के होते हैं. एक वास्तविक और दूसरा काल्पनिक या आभासी, और दोनों का सम्बन्ध हमारी मानसिक अवस्था से होता है. वास्तविक डर वो होता है जिसका हमें पता होता है कि वो कहाँ पर है या उसका कहाँ पर सामना करना पड़ेगा.काल्पनिक या आभासी डर वो है जो अज्ञात है किन्तु ये भय वो है जो आशंकाजनित होता है, ये प्रायः आधारहीन होता है या फिर कभी-कभार इस का आधार हो भी सकता है.किन्तु अज्ञात के प्रति उत्पन्न भय या दर किसी होनी की आशंका से उपजा होता है और इसकी पकड़ अवचेतन मन के साथ मनुष्य की चेतना पर भी होती है. आशंका से उपजा दर हमारी विचार शैली के साथ-साथ कार्य-शैली को भी प्रभावित करता है और हमारे कार्य की परिणाम पर भी प्रभाव डालता है.

किसी कार्य के प्रारंभ में ही उसके परिणाम के विषय में हमारी नकारात्मक सोच उस कार्य की सफलता के प्रति आशंका को जन्म देती है और इससे जो भय हमारे हृदय में उत्पन्न होता है वह हमारी मानसिक चेतना को भी जकड़ लेता है और यही हमारी कार्य क्षमता को भी प्रभावित करता है जिसके कारण हमारा जो उत्साह और जोश काम करने की चाहत को लेकर होता है वह कम हो जाता है. और कार्य को आधे-अधूरे व आशंकित मानसिक स्थिति से करने पर, कार्य की असफलता का जो डर हमारे मन में उपजा होता है वह हकीकत बन कर हमरे सामने खड़ा हो जाता है.अतः नकारात्मक विचार  व भाव हमेशा काल्पनिक डर का मूल हुआ करते हैं.सो आवश्यकता है एक सकारात्मक सोच या विचार शैली की जो हमारी सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है और हमारे मन में उपजे डर पर विजय दिलवाता है.

बहुत अधिक भावुकता या संवेदनशीलता भी रिश्ते-नातों के लिए एक अव्यक्त से डर की उत्पति का कारण बनती है. किसी अपने के लिए आधारहीन  काल्पनिक भय अति रागात्मकता का परिणाम होती है. किसी अपने को खो देने का डर इस हद तक बढ़ जाता है की इन्सान की भूख प्यास भी छीन लेता है, ऐसी सोच इन्सान की सोचने की ताकत पर बहुत ही नकारात्मक प्रभाव डालता है. ऐसा व्यक्ति तनावग्रस्त जीवन जीता है और भयग्रस्त जो जाता है और अपने आसपास के लोगों के लिए भी मानसिक त्रास का कारण बन जाता है. हमारे कृत्यों का परिणाम यदि किसी भय को पैदा करता है तो वह वास्तविक ही होता है. कुछ भी हो डर या भय को स्वयं पर हावी न होने दें बल्कि उसका सामना पुरे जोश व निडरता से करें फिर देखिये डर स्वयं ही भाग जायेगा.