गुरुवार, 21 अगस्त 2014

कविता

ये शहर:'गीतिका-गुंजन
अजीब सी आई
आज ये सहर है.
न जाने किस सोच में
डूबा ये शहर है.
हादसा दर हादसा कैसा?
टूटा इस पर कहर है.
जिंदगी यहाँ चलती तो है:
पर गुमसुम ये शहर है .
हर हाथ में पत्थर है.
आईनों का ये शहर है.
ये शहर:'गीतिका-गुंजन-10'

अजीब सी आई 
आज ये सहर है.
न जाने किस सोच में 
डूबा ये शहर है.
हादसा दर हादसा कैसा?
टूटा इस पर कहर है.
जिंदगी यहाँ चलती तो है:
पर गुमसुम ये शहर है .
हर हाथ में पत्थर है.
आईनों का ये शहर है.


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