शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

14 सितंबर- हिंदी दिवस का एक दिन

आइये आपनी मातृभाषा और राष्ट्र भाषा को याद करें ...

आज फिर से 14 सितम्बर का दिन आ  है और ये दिन हमने अपनी राष्ट्र भाषा के नाम कर रखा है, हो भी क्यों न...अरे ! जब जन्मदिन, सालगिरह,अवसान दिवस, पिता दिवस ... इसी तरह के न जाने कितने ही दिवस साल भर में  हैं, उसी प्रकार से राष्ट्र भाषा के लिए भी एक दिन तय कर दिया गया है।

आज के दिन से आम इंसान को क्या लेना- देना,उसे तो आज के दिन भी सुबह उठकर अपनी दिनचर्या के अनुसार काम करना है, वो अगर इस दिन के  में जान भी ले तो भी मात्र सर हिलाकर  चलता बनेगा और सोचेगा आज भी कोई जयंती है। पर इससे उसकी जिंदगी  में  बदलने वाला नहीं ... और आपके और हमारे लिए भी कुछ बलेगा क्या ...??

 ऐसा है  कि आप और हम आम इंसान से थोड़ा अलग हट कर हैं और थोड़ा अलग सोचते भी हैं, इसलिए ही तो हिन्दी दिवस पर कुछ होता है, पर ...क्या ?? नहीं जानते,पर ... विचार तो कर ही लेते हैं। हम से अलग भी कुछ मनुष्य श्रेणी के  हैं जिनके लिए ये दिन खासा मायने रखता है। और हो भी क्यों ना ...!

 इसी दिन के लिए वे तरसते भी हैं. सबसे पहले जो इस पंक्ति में पहले नम्बर पर आते हैं वो हैं, हमारे प्यारे नेता गण- पर इसमें भी छुटभैये नेता अपना नम्बर मार लेते हैं याने बड़े नेता भैया से पहले नम्बर लगा लेते हैं और बड़े भैया भी आज के दिन अपना कर्तव्य निभाने में पीछे नही हटते। .नेताओं को हिंदी समारोहों में बुलवाया जाता है, तैयार किये हुए भाषण से वे हिंदी की दुर्दशा पर अपने सौ-सौ घड़ियाली आँसू बहाते हैं और इसका दोष विरोधी पार्टी पर डाले बिना नहीं रहते, इसके बाद स्वल्पाहार लेते हैं और चलते बनते हैं. याने वे हिंदी दिवस को सार्थक कर देते हैं.

 दूसरी मानव श्रेणी में आने  वाले   लोग  हैं  अधिकारी  वर्ग है.  इस वर्ग  के लोग  हिंदी दिवस पर अपना जन्मसिद्ध   अधिकार  समझते  हैं, और इस दिन सरकारी  खर्चे  पर समारोहों का   आयोजन  जगह -जगह  करते  हैं, जहाँ  किसी साहित्यकारों  को अतिथि बनाकर  बैठा  दे ते हैं और कुछ  फूलों  के हार  से उनका  स्वागत  कर उन्हें  हिंदी दिवस पर अपने विचारों   को व्यक्त करने के लिए  आमंत्रित  करते  हैं और वे हिंदी की दुर्दशा पर जार-जार रोते हैं और अपनी चिंता को बेहद ही कवितामय अंदाज़  में सुनकर अपनी साहित्य क्षुधा शांत कर लेते हैं.

 उच्च कोटि के साहित्यकारों की हिंदी की दुर्दशा के प्रति गहन चिंता साफ़-साफ़ उनके शब्दों से प्रकट होती है और उन्हें इस बात का मलाल भी रहता है कि हम हिंदी के विकास और संवर्धन के लिए केवल भाषण और किताबी बातें करते हैं, जिन्हें वास्तव में हिंदी के बुरे दौर कि चिंता है वे शांत सलिल कि तरह अपना काम बिना किसी प्रचार के कर रहे हैं और वास्तव में ऐसे लोगों के प्रयास से ही हिंदी  अपने अस्तित्व   को कायमरखे  है. अन्यथा के हिंदी तथाकथित पैरोकारों ने हिंदी कि जिन्दा मैयत निकलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. ये लोग उस जमात से हैं जो ये सोचते हैं यदि वे  होते न होते तो हिंदी भाषा ही ना होती। इन्हें आप चलताऊ  साहित्यकार मान सकते हैं, ये किसी को भी पानी पी-पी कर कोसते हैं  हिन्दी की इस हालत का ठीकरा किसी के भी सिर पर फोड़ने से गुरेज नहीं करते और हिंदी दिवस की दावतें उड़ाने में पीछे नहीं रहते।


हिंदी की यह दुर्दशा क्यों ...??

हिंदी अन्य कई भारतीय भाषाओँ से पिछड़ी  हुई क्यों है ...??

ये सवाल आज भी मुँह बाएं खड़ा है। जिसका  जिसका जवाब अभी खोजना बाकि ह।उसकी इस हालत के लिए हम सब जिम्मेदार हैं और इसके लिए किसी हिन्दी दिवस पर मातम मनाने की बजाये उसके हास को रोकने की चेष्टा करें और किसी सरकारी प्रयास का रास्ता देखने की अपने तरीके ये प्रयास आरम्भ करें। एक बात  का
ध्यान रखना रखना भी आवश्यक है की हम अपनी राष्ट्र  भाषा पर गर्व करना सीखें न की ना की अंग्रेजी के सामने उसे हेय दृष्टि से देखें।
                                                       

                                          
                                                               वीणा सेठी








2 टिप्‍पणियां:

  1. यही तो विडम्बना है हमारे देश की या यूं कहिए की देशवासियों की,कि कहने को भारत एक अनेकता में एकता का प्रतीक माने जाने वाला देश है मगर यहाँ के निवासी वास्तव में अपने आप में ही इस कदर बटे हुए हैं कि हर कोई अपनी मातृ-भाषा अपनी जाती के अनुसार बताता है जैसे बंगाल में रहने वाला व्यक्ति हमेशा खुद की मातृ भाषा बंगाली बताएगा,हिन्दी नहीं उसी तरह देश के सभी राज्यों में बोली जाने वाली अलग-अलग भाषा के लोग अपनी-अपनी मातृ भाषा उसी आधार पर बताते हैं कभी कोई अपने आप को सबसे पहले भारतीय सोचकर हिन्दी का नाम नहीं लेता। ऐसे हालातों में भला उस देश में अन्य दिनों की तरह हिन्दी दिवस मनाया जाना क्या गलत है। एक दिन के लिए ही सही लोग हिन्दी की बात तो करते हैं दिखावा ही सही एक दिन के लिए लोग उसे अपनी मातृ भाषा तो मानते है।

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  2. हिन्दी पखवाड़े की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
    --
    बहुत सुन्दर प्रविष्टी!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (16-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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