बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

कविता-.......................13

रोटी:एक यक्ष प्रश्न  

एक ख्वाब देखा था
         रोटी का.
दुनिया ने जब
आँखें खोलने का मौका दिया;
तब
सुलगता सा प्रश्न देखा
          रोटी का.
समाज के वर्गों सा
मैंने;
आकर बदलता देखा
         रोटी का.
अमीर की डायनिंग टेबल पर
सोने की थाली में सजी रोटी;
पर
गरीब के
हाथ में है प्रश्न बिलखता
             रोटी का.
शामिल हुआ जब मै
दौड़ में जिंदगी की;
तब
सुरसा सा
सामने आया प्रश्न कमाना
             रोटी का.
स्वप्न सब हवा हुए
चक्रवात में रोटी के,
कोलतार की गर्म सड़क पर;
स्वयं को घसीटता
अब
मै स्वयं सुलग रहा हूँ,
तवे की झुलसी हुई रोटी सा.  




वीणा सेठी.

10 टिप्‍पणियां:

  1. यही ज़िन्दगी की सच्चाई है रोटी के इर्द गिर्द घूमती हुई।

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  2. सार्थकता लिए सशक्‍त अभिव्‍यक्ति

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    1. मेरी कोशिश हमेशा यही रहती है कि कुछ अच्छा लिखूं .

      हटाएं

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