बुधवार, 15 अगस्त 2012

कविता ....आजादी की इस पावन बेला पर आज का भारत

सिमटते दायरे

मजहब और कौम के दायरे में
हम सिमट गए;
इन्सान की इंसानियत से
हम भटक गए.
जो गलियां-ओ-कूँचे रौशन थे
 गुल्जारों  से;
वो  इन्सान की दरिंदगी  से
वीरान हो गए.
जो कहते थे;
बहिश्त जमीं पे लायेंगे,
वो गैरों के टुकड़ों पे
नीलाम हो गए.
जो फूल खिले थे;
बहारों के साए तले,
वो खिजां में मुरझा के
दम तोड़ गए.
जो ख्वाब पाले थे
मासूमों की आँखों में;
वो आज दरिंदों के पैरों तले 
कुचल गए.
जो अरमान मचले थे
किन्ही नूरानी आँखों में;
वो मजहब की कातिल दीवारों में
चिन गए.
जिंदगी के ख्वाब और अरमान
जब दफ्न हो गए;
सोचा:
क्या करे जीकर कोई...?
पर
जब हम ढूंढने निकले
तो
मौत के दाम मंहगे हो गए.


वीणा सेठी  

6 टिप्‍पणियां:

  1. आह!!!!
    दिल को छू गयी.....

    सादर
    अनु

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  2. वाह आज की सच्चाई बयान करती हुई रचना बहुत खूब

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  3. वाह ! क्या गजब कहा
    जब हम ढूँढने निकले
    तो मौत के दाम महंगे हो गये

    उत्तर देंहटाएं

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