शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

कहानी 7..........(दोराहे पर नारी)

 दोराहे पर नारी------------------------१


मेरी एक सहेली हर्षा एक कंपनी में कंप्यूटर ओपेरटर है और महीने में लगभग अच्छा-खासा कम लेती है। उसकी - साल की बेटी है। हर्षा का पति उससे कम कमाता है और हर्षा ने अपनी पगार घर में कम बता के रखी है। हर्षा घर के बहार की दुनिया में कदम नहीं रखना चाहती थी पर पति की कम कमाई के तानों ने उसे घर से बाहर कदम रखने को मजबूर कर दिया। बेटी के जनम के पहले भी वो एक फिरम में बतौर क्लर्क कम करती थी। किन्तु उसकी नौकरी उसकी सास ने छुड़वा दी थी ये कहकर की उससे घर का कम नहीं होता। अब बेटी के जन्म के बाद उसकी परवरिश के के लिए पैसों की तंगी का रोना उसकी सास ने पुनः शुरू कर दिया तो हर्षा ने एक बार फिर से नौकरी करने की सोची और अब वह कंप्यूटर ओपरेटर है। कहने को तो वो आर्थिक रूप से स्वतंत्र है पर उसकी कमाई उसे अभी भी सास के हाथ में देनी पड़ती है जिसमे से उसकी सास उसे महीने की पॉकेट मनी के रूप में २००-३०० रुपये दे देती है।
हर्षा को आब नौकरी करते हुए - साल हो चुके हैं और वह आर्थिक रूप से अपनी स्थिति से संतुष्ट है। किन्तु पिछले कुछ दिनों से उसकी सास ने पते की रट लगनी शुरू कर दी है। जिससे हर्षा मानसिक तनाव से गुजार रही है पूर्व में जब हर्षा जब एक बार और गर्भवती हुई थी तब उसकी सास ने दूसरे बच्चे की परवरिश के लिए पैसों की कमी का रोना रोकर उसका गर्भपात करवा दिया था, किन्तु अब फिर से उनकी पोते की इच्छा बलवती होने लगी और यही बात हर्षा के लिए परशानी का सबब बनती जा रही थी, शाम को ऑफिस से लौटते जब वह मिलने आयर तो बोली, क्या करूँ दीदी? मै तो शिखा (बेटी का नाम) के जन्म से ही खुश हूँ.............. और अब मम्मी ने पोते की रट लगनी शुरू कर दी है, अभी तो मै अच्छे से कम ले रही हूँ................. और शिखा की हर मांग को पूरा कर पाती अगर दुबारा बच्चे के बारे में सोचा तो नौकरी तो हाथ से जाएगी साथ में दुबारा ऐसी नौकरी मिलेगी कहना मुश्किलहै?............................. क्या करू.........................?, मैंने उसे कहा की उसने शैली (पति का नाम) बात की ? इस पर हर्षा ने बताया, " मैंने इनसे बात की तो वो चिढ़कर बोले की मम्मी बड़ी हैं और समझदार हैं , उन्होंने कुछ सोच कर ही कहा होगा, ऐसा कहकर उन्होंने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड लिया, अब मै क्या करू.................? कुछ समझ नहीं रहा?" हर्षा के चारे पर लाचारी के भाव थे और मेरी सोच वाही घूम रही थी की क्या वाकी आर्थिक आजादी को नारी की वास्तविक आजादी समझने की कही हम भूल नो नहीं कर रहे.........?

1 टिप्पणी:

  1. सिर्फ़ आर्थिक रूप से सक्षम होना आज़ादी की मोहर नही है आज भी सोच मे रूढियों की जग लगी हुयी है………जब तक नारी खुद इसके लिये प्रयास नही करेगी कभी आज़ाद नही हो पायेगी।

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