बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

यादें..........1

केले का छिलका----


" अरे बुड्ढ़े! पागल है साला, रोज आकर केले के छिलके समेटता रहता है। " मेरे कानों को इन शब्दों के साथ ही कुछ हँसने के स्वर भी सुने दिएमैंने घूमकर देखा कुछ लोग एक ७० साल के बुजुर्ग पर हंस रहे केमै फ्रूट मार्केट में फ्रूट खरीदने आई थीवह बुजुर्गवार सड़क पर पड़े केले के छिलके उठाकर  सड़क के किनारे कर रहे थे, लोगों की हंसी उनके कम में कोई व्यवधान नहीं डाल रही थी, निर्लिप्त भाव से वे अपना कम कर रहे थेजिस ठेले से मै फल ले रही थी पूछने पर उसने बड़े ही दुखी स्वर में बताया कि कुछ साल पहले ऐसे ही किसी के सड़क पर डाले केले के छिलके ने उनके इकलौते बेटे की जान ले ली थी और तबसे ही ये ऐसे सड़क पर पड़े केले के छिलके उठाकर सड़क के किनारे कर देते हैं।
कहना नहीं होगा की उस दिन के बाद जब भी किसी भी रह से गुजरना होता है तो आँखें केले का छिलका ढूंढने निकल पड़ती हैं और कहीं पड़ा दिख जाता है तो अनायास ही पैर की एक ठोकर से उसे सड़क के किनारे कर देती हूँ पर चोर नजरों से ये भी देखती रहती हूँ कोई देख तो नहीं रहा, शायद ये मन का चोर है की कहीं हँसी का पात्र न बन जाऊं ...........पर ये याद रखने की कोशिश अवश्य करती हूँ की कहीं कोई और किसी केले के छिलके का शिकार ना हो जाये??.................






3 टिप्‍पणियां:

  1. उस बाप की मनोदशा समझ सकता हूँ.

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  2. जिसका दुख होता है, वही जान सकता है।

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  3. मार्मिक
    वाकई केले के छिलके को नज़रअन्दाज नहीं किया जा सकता यह भी जानलेवा हो सकता है.

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