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सोमवार, 4 मई 2015

बात एक अनकही सी-प्यारा सा घर हमारा


प्यारा सा-एक घर हमारा

आइये मकान को घर बनायें-------

 "घरऔर "मकाशब्द दो हैं पर अर्थ एक ही है अर्थात ' रहने की जगह'. और दोनों शब्दों में एक मूलभूत अंतर है. 'मकान' ईंट, रेत, सीमेंट से ढाला गया एक आकर होता है और 'घर' उसमें बसेरा करने वाले इंसानों से बनता है. दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएँ, कहीं भी रह आयें इन्सान  की पनाहगाह घर  ही होती है. 'मकान' तभी 'घर' होता है जब उसमें रहने वाले उसे सही मायनों में घर बनाना चाहते हों. कोई भी घर ' तेरा-मेरा घर' होने पर घर  नहीं बल्कि मकान बन जाता है. घर जब ' हमारा घर' बनता है तभी 'घर' सार्थक होता है. 

मकान नहीं घर



                                          

'
हमारा घर ' हर आदमी का सपना होता है. पर उसे वह तभी पूरा कर सकता है, जब वह उसे अपनेपन से सराबोर कर दे. ये 'घर' परिवार के किसी एक सदस्य से भी नहीं बन सकता, बल्कि सबकी मिली-जुली कोशिशों एवं सहयोग से ही संभव है. आज के दौर में जिंदगी की इस आपाधापी में रिश्ते, जो कोमल पौधे की तरह होते हैं, को संभालकर और सहेज कर रखना और भी कठिन होता जा रहा है.एक घर को 'तेरा-मेरा' की जगह ' हमारा ' बनाना वास्तव में कठिन हो सकता है, असंभव नहीं. केवल कुछ एक बातों को फिर से याद करने की, उन्हें समझाने की जरुरत है. ये बातें हमें मालूम हैं, इन्हें सिखाने व समझाने की भी जरुरत नहीं.
 गिले- शिकवे का दौर खत्म हो:-- हर घर में रहने वालों की अमूमन एक-दूसरे से शिकायत हुआ करती है. सामान्यतः यह शिकायत स्वाभाव को लेकर होती है. पर एक बात स्वयं के लिए भी जानना आवश्यक है की जो शिकायत दूसरों से होती है वही दूसरों को आपसे हो सकती है.इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया जाये तो गिले-शिकवे की आदत ख़त्म हो जाती है. बतौर एक शायर:-     
·                                 " जब किसी से कोई गिला करना", सामने अपने आइना रखना."
· 
  कुछ अपनी सुनाएँ, कुछ दूसरों की सुने:- घर में सबका अलग-अलग स्वभाव होता है. कोई कम बोलना पसंद करता है कोई अधिक बोलना. हर व्यक्ति अपनी बात  को ही अधिक महत्व देना चाहता है, इसलिए दूसरे की बात ध्यान से सुनाने की आवश्यकता नहीं समझता  जिससे मामला एक तरफ़ा हो जाता है. विचारों में मतभेद भी हो सकते हैं पर आपसी तालमेल के लिए जरुरी है की कुछ अपनी कहें व कुछ दूसरों की सुने और सहमति से बात को किसी बिन्दू पर लाकर छोड़ें. बातचीत दिलचस्प हो जाएगी और घर का माहौल भी खुशगवार हो जायेगा.

काम के लिए हाथ बढ़ाएं:- घर में काम करने की बात को लेकर अक्सर शिकायत रहा करती है. किसी सदस्य को दूसरे का काम कम लगता है और स्वयं का अधिक, इससे तो अच्छा है कि मिल-जुल कर काम किया जाए, जिससे किसी एक ही व्यक्ति पर काम का बोझा अधिक न रहे. " साथी हाथ बटाना साथी रे " कि उक्ति पर अमल लेन पर 'घरघर बन जायेगा.
प्यार व आदर का खुलकर इजहार करें:- आपस में एक-दूसरे के लिए प्यार है, स्नेह है या फिर सम्मान है इसका खुलकर इजहार करें . ये छुपाने वाली चीजें नहीं किन्तु इनका उपरी दिखावा कदापि  करें . कार्य कि प्रशंसा करना भी एक तरीका है. एक-दूसरे को गिफ्ट देना भी प्यार के इजहार का एक प्यारा सा ढंग है. ' सरप्राइज गिफ्ट ' के क्या कहने! ये दिलों को नजदीक लाता है और पारिवारिक बंधन और अधिक मजबूत होते हैं.
घूमने-फिरने जाएँ:- परिवार के सदस्यों के साथ कभी-कभी बाहर भी जाना 'घर' को जीवन्त बनाये रखने के लिए बहुत जरुरी है. आउटिंग पर जाने का मतलब  घर के सदस्यों का एक साथ बैठना, खाना, बातचीत. हँसीं-मजाक करना. घर-परिवार कि समस्या से दूर आनंद के ये पल परिवार को और नजदीक ही लाते हैं. एक लम्बी ड्राइव, शानदार डिनर या फिर एक पिकनिक से जानदार आउटिंग कोई हो ही नहीं सकती और अगर ये सरप्राइजिंग हो तो मजा दुगुना हो जाता है. पर पहले ये जरुर जान लें कि कोई सदस्य किसी काम में मसरूफ तो नहीं, नहीं तो आपका सरप्राइज आपके लिए ही ' शॉकिंग सरप्राइज ' हो जाए. कभी-कभी एक सुंदर सी ड्रेस का उपहार खुशियों को कई गुना बढ़ा देता है.
ये बातें परिवार-घर को 'तेरा-मेरा' से ' हमारा ' में बदल देतीं है. ऐसे ' हमारे-घर ' में एक शाम को काम से थककर हर इन्सान लौटकर आना चाहता है, जँहा कुछ लोग आपकी वापसी के इंतज़ार में अपनी पलकें बिछाए रहते हैं. शाम को घर लौटकर एक कप गरमा-गरम चाय के साथ दिनभर कि व्यस्तता को गपशप का चटपटी  बातों भरा नाश्ता सारे दिन कि थकान को दूर करने के लिए काफी होता है. पर शर्त यही है कि ' हो प्यारा-सा घर हमारा '.   
Veena Sethi.


गुरुवार, 2 अगस्त 2012

कुछ अनकहा सा ----प्यारा सा-एक घर हमारा


आइये मकान को घर बनायें----

 "घरऔर "मकाशब्द दो हैं पर अर्थ एक ही है अर्थात ' रहने की जगह'. और दोनों शब्दों में एक मूलभूत अंतर है. 'मकान' ईंट, रेत, सीमेंट से ढाला गया एक आकर होता है और 'घर' उसमें बसेरा करने वाले इंसानों से बनता है. दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएँ, कहीं भी रह आयें इन्सान  की पनाहगाह घर  ही होती है. 'मकान' तभी 'घर' होता है जब उसमें रहने वाले उसे सही मायनों में घर बनाना चाहते हों. कोई भी घर ' तेरा-मेरा घर' होने पर घर  नहीं बल्कि मकान बन जाता है. घर जब ' हमारा घर' बनता है तभी 'घर' सार्थक होता है .

'मकान' नहीं "घर "
हमारा घर हर आदमी का सपना होता है. पर उसे वह तभी पूरा कर सकता है, जब वह उसे अपनेपन से सराबोर कर दे. ये 'घर' परिवार के किसी एक सदस्य से भी नहीं बन सकता, बल्कि सबकी मिली-जुली कोशिशों एवं सहयोग से ही संभव है. आज के दौर में जिंदगी की इस आपाधापी में रिश्ते, जो कोमल पौधे की तरह होते हैं, को संभालकर और सहेज कर रखना और भी कठिन होता जा रहा है.एक घर को 'तेरा-मेरा' की जगह ' हमारा ' बनाना वास्तव में कठिन हो सकता है, असंभव नहीं. केवल कुछ एक बातों को फिर से याद करने की, उन्हें समझाने की जरुरत है. ये बातें हमें मालूम हैं, इन्हें सिखाने व समझाने की भी जरुरत नहीं.
 गिले- शिकवे का दौर खत्म हो:-- हर घर में रहने वालों की अमूमन एक-दूसरे से शिकायत हुआ करती है. सामान्यतः यह शिकायत स्वाभाव को लेकर होती है. पर एक बात स्वयं के लिए भी जानना आवश्यक है की जो शिकायत दूसरों से होती है वही दूसरों को आपसे हो सकती है.इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया जाये तो गिले-शिकवे की आदत ख़त्म हो जाती है. बतौर एक शायर:-     
·                                 " जब किसी से कोई गिला करना", सामने अपने आइना रखना."
· 
  कुछ अपनी सुनाएँ, कुछ दूसरों की सुने:- घर में सबका अलग-अलग स्वभाव होता है. कोई कम बोलना पसंद करता है कोई अधिक बोलना. हर व्यक्ति अपनी बात  को ही अधिक महत्व देना चाहता है, इसलिए दूसरे की बात ध्यान से सुनाने की आवश्यकता नहीं समझता  जिससे मामला एक तरफ़ा हो जाता है. विचारों में मतभेद भी हो सकते हैं पर आपसी तालमेल के लिए जरुरी है की कुछ अपनी कहें व कुछ दूसरों की सुने और सहमति से बात को किसी बिन्दू पर लाकर छोड़ें. बातचीत दिलचस्प हो जाएगी और घर का माहौल भी खुशगवार हो जायेगा.

काम के लिए हाथ बढ़ाएं:- घर में काम करने की बात को लेकर अक्सर शिकायत रहा करती है. किसी सदस्य को दूसरे का काम कम लगता है और स्वयं का अधिक, इससे तो अच्छा है कि मिल-जुल कर काम किया जाए, जिससे किसी एक ही व्यक्ति पर काम का बोझा अधिक न रहे. " साथी हाथ बटाना साथी रे " कि उक्ति पर अमल लेन पर 'घरघर बन जायेगा.
प्यार व आदर का खुलकर इजहार करें:- आपस में एक-दूसरे के लिए प्यार है, स्नेह है या फिर सम्मान है इसका खुलकर इजहार करें . ये छुपाने वाली चीजें नहीं किन्तु इनका उपरी दिखावा कदापि  करें . कार्य कि प्रशंसा करना भी एक तरीका है. एक-दूसरे को गिफ्ट देना भी प्यार के इजहार का एक प्यारा सा ढंग है. ' सरप्राइज गिफ्ट ' के क्या कहने! ये दिलों को नजदीक लाता है और पारिवारिक बंधन और अधिक मजबूत होते हैं.
घूमने-फिरने जाएँ:- परिवार के सदस्यों के साथ कभी-कभी बाहर भी जाना 'घर' को जीवन्त बनाये रखने के लिए बहुत जरुरी है. आउटिंग पर जाने का मतलब  घर के सदस्यों का एक साथ बैठना, खाना, बातचीत. हँसीं-मजाक करना. घर-परिवार कि समस्या से दूर आनंद के ये पल परिवार को और नजदीक ही लाते हैं. एक लम्बी ड्राइव, शानदार डिनर या फिर एक पिकनिक से जानदार आउटिंग कोई हो ही नहीं सकती और अगर ये सरप्राइजिंग हो तो मजा दुगुना हो जाता है. पर पहले ये जरुर जान लें कि कोई सदस्य किसी काम में मसरूफ तो नहीं, नहीं तो आपका सरप्राइज आपके लिए ही ' शॉकिंग सरप्राइज ' हो जाए. कभी-कभी एक सुंदर सी ड्रेस का उपहार खुशियों को कई गुना बढ़ा देता है.
ये बातें परिवार-घर को 'तेरा-मेरा' से ' हमारा ' में बदल देतीं है. ऐसे ' हमारे-घर ' में एक शाम को काम से थककर हर इन्सान लौटकर आना चाहता है, जँहा कुछ लोग आपकी वापसी के इंतज़ार में अपनी पलकें बिछाए रहते हैं. शाम को घर लौटकर एक कप गरमा-गरम चाय के साथ दिनभर कि व्यस्तता को गपशप का चटपटी  बातों भरा नाश्ता सारे दिन कि थकान को दूर करने के लिए काफी होता है. पर शर्त यही है कि ' हो प्यारा-सा घर हमारा'.
वीणा सेठी 

सोमवार, 4 जून 2012

कविता .........7

आदमी

आदमी


आदमी से इस कदर ख़फा है आदमी;
कि
ख़ुद से बेज़ार हो गया है आदमी.

लहू इस कदर बेरंग हो चला है;
कि
रिश्तों से अन्जान हो चला है आदमी.

हवा का रुख इस कदर बदला;
कि
एहसास से परे हो चला है आदमी.

दहशतगर्दी से इस कदर दोस्ताना;
कि
इंसानियत से परे हो चला है आदमी.

इस पर भी सितम देखिये जरा'
कि
ख़ुद को इंसान मानने से बच रहा है "आदमी".

मंगलवार, 15 मार्च 2011

-यादें...2(उसकी आँखों का ख्वाब))


आँखों में ख्वाब


रेल ले सफ़र में सामने की बर्थ पर बैठी लड़की पर ध्यान गया तो पाया की उसकी पथराई हुई आँखों को देख कर लग रहा था कि वह ग़म कि उस महीन रेखा से आगे जा चुकी है, जहाँ और कोई ग़म के आ जाने पर भी अब कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला था. उसकी आँखे खिड़की के उसपार फलक पर कुछ तलाश रही थीं. 

परिवार के दूसरे लोग सामने और मेरे साथ वाली बर्थ पर बैठे थे. उनकी बातों से लग रहा था कि वे सब हरिद्वार से लौट रहे थे. मायके और ससुराल के रिश्ते-नातों के बीच बैठी वह लड़की के शरीर पर सफ़ेद कपड़े थे और सर सफ़ेद दुप्पटे से ढका था , सूनी मांग और चूड़ी विहीन हाथ उसकी कहानी खुद ही बयां कर रहे थे. 

उसकी हालत को देख कर भारतीय समाज कि विडंबना पर क्षोभ और दुख हो रहा था, आदमी कि इस दुनिया ने नारी को पुरुष कि परछाई बन कर रख दिया है, जहाँ पुरुष के नाम कि कुछ निशानियाँ नारी को दी गई हैं जो उसे उस पुरुष के नाम पर धारण करनी पड़ती है जो उसका पति होता है और पति के न होने कि स्थिति में उसे उन निशानियों को हटा देना पड़ता है. ये सब यही दर्शाता है कि नारी व्यक्तिगत या सार्वजनिक सम्पति कि तरह है.
भारतीय समाज में वो चाहे कितना ही आधुनिक क्यों न हो गया हो पर आज भी विचारों के धरातल पर कुछ भी नहीं बदला है. फिर एक विधवा पर तो लोगों कि कड़ी नजर वैसे ही  रहती है.
वह लड़की भी शायद दुनिया के इस चलन से अभी दो-चार नहीं हुई थी,मै उसे खिड़की से बाहर झांकते हुए देख रही थी, मैंने देखा कि चुनरी कि ओट से बाहर देखती हुई उन आँखों में ख़ुशी कि एक हलकी सी लकीर उभर आई थी , यक़ीनन यादों का कोई खुशनुमा पल उसकी आँखों के आगे तैर गया था, या फिर भविष्य के लिए कोई सपना आकर आँखों में घर बना रहा था, जो भी था एक अच्छा आगाज था, पर जैसे ही वो पलती उसकी आँखों में वही सूनापन नजर आ रहा था.

               







शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

कहानी......नारी-1

मेरा घर कहाँ है????....................

हमारी काम वाली बाई का नाम 'मिनी' है उसकी आवाज में बच्चों की सी मासूमियत है जब बोलना शुरू कराती है तो रुकने का नाम ही नहीं लेती बर्तन मांजने बैठती है बातों में इतना खो जाती है कि एक ही बर्तन को चमकाने में लगी रहती है तो उसे टोकना पड़ता है ,'मिनी अब दूसरा बर्तन भी मांज क्या एक ही बर्तन लेकर सारा दिन बैठी रहेगी?."और जैसे वो सोते से जग जाती और जल्दी जल्दी हाथ चलने लगती
मिनी जैसे ही दरवाजा खटखटाती है पता चल जाता है की मिनी आई है पर आज जब मिनी आई तो हमें उसके आने का पता ही नहीं चलामिनी आँगन में आकर चुपचाप बर्तन धोने लगी , ये देखकर मैंने चुटकी ली, " क्या बात है! आज तेरा टेप बंद है"। इतने पर भी वह कुछ नहीं बोलीमैंने फिर उसे छेड़ने वाले अंदाज में पूछा तो उसने जैसे ही अपना सर ऊपर उठाया तो देखा उसकी आँखों में आंसू थेभरी आँखों से उसने कहा, " दीदी! रात को मेरा आदमी बाहर से फिर पी कर आया, तो मैंने उससे कहा की इतनी मत पिया करो, बच्चे भी पूछते हैं , उनपर भी गलत असर पड़ेगा"। तो मेरे आदमी ने मुझपर हाथ उठा दिया और मारते हुए बोलने लगा, ' साली समझती क्या है अपने आप को ! मै अपने घर से निकाल दूंगा '। मिनी मुझसे सवाल कर रही थी, " बताओ न दीदी ! मेरा घर कहाँ है??"

मिनी रोये जा रही थी और उसकी आँखों में एक सवाल तैर रहा था आखिर उसका घर कौनसा है? उसका घर कंहा है???।

ये एक ऐसा सवाल है जो आज भी इस देश की ९९.९९ % नारियाँ स्वयं से कर रही हैं

क्या इसका जवाब आपके पास है?????????????..................



 




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