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सोमवार, 4 जून 2012

कविता .........7

आदमी

आदमी


आदमी से इस कदर ख़फा है आदमी;
कि
ख़ुद से बेज़ार हो गया है आदमी.

लहू इस कदर बेरंग हो चला है;
कि
रिश्तों से अन्जान हो चला है आदमी.

हवा का रुख इस कदर बदला;
कि
एहसास से परे हो चला है आदमी.

दहशतगर्दी से इस कदर दोस्ताना;
कि
इंसानियत से परे हो चला है आदमी.

इस पर भी सितम देखिये जरा'
कि
ख़ुद को इंसान मानने से बच रहा है "आदमी".

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