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बुधवार, 25 मार्च 2015

ख़ुशी के पल



दिल ढूंढता है ख़ुशी के पल...

इन्सान का वजूद इस धरती पर और जीवित प्राणियों से कई मायनों में फर्क है और एक बात और भी है जो उसे दूसरों से अलग करती है और ये हम सब जानते हैं. इंसानी दिमाग का कोई मुकाबला हो ही नहीं सकता. इसी दिमाग के बल पर वह दुनिया पर राज कर रहा है, ये दिमाग भी इंसानी शरीर के एक भाग के आगे बेबस हो जाता है. ये इंसानी दिल है जो दिमाग को हरा देता है.
इन्सान के अन्दर उठने वाले अलग-अलग भावनाएँ इसी दिल में पैदा होती हैं, हिलोर लेती हैं और यहीं ख़त्म भी हो जाती हैं. अब इस दिल में अगर ख़ुशी जागती है तो गम भी यहीं पनाह लेता है. इसी तरह के आवेगों और संवगों को दिल सम्हाले रखता है.
ये सच है कि इन्सान जिंदगी भर ख़ुशी और गम के पलों में ही जिंदगी की सांसों का हिसाब खोजता  रहता है. ख़ुशी के पल में वो हँसता और मुस्कराता है और दुख के पलों में उसे जीवन बोझिल लगने लगता है और ऐसा लगता है मानो वक्त थम सा गया है और शायद यही ठहरा रहेगा. ख़ुशी के पल तो मानों पंख लगा कर उड़ जाते हैं. बिल्कुल चार दिन की चांदनी की तरह. अब जिंदगी के इस गणित में, वैसे देखा जाये तो शायद ... ख़ुशी का पलड़ा हल्का ही लगेगा. पर ... ये सब दिल से महसूस करने की बात है. पर... ये दिल है कि मानता नहीं. और चल पड़ता है ख़ुशी के पलों की तलाश में. अब जब Coca-Cola International Day of Happiness ने ख़ुशी के
 पलों की तलाश का तरीका पूछा है तो ... बताना तो पड़ेगा ही! 

Happniess-Image from google.com

अगर जिंदगी को सहजता और सरलता से जीना है तो खुशियों के लिए कहीं जाना नहीं पड़ेगा और खुशियाँ ढूंढने कहीं जाना भी नहीं पड़ेगा.
मेरा ख़ुशी ढूंढने का तरीका बेहद आसान है, शायद आपको भी भा जाये. खुशियाँ छोटी-छोटी बातों में खोजना बेहद सरल है. और इसमें कोई जोखिम नहीं और कोई खर्चा नहीं होता, ये फ्री में मिल जाती है बस थोड़ा सोचना पड़ता है. मै जब भी उदास होती हूँ या कुछ अन्यमनस्क सी होती हूँ तो कुछ देर के लिए... कुछ पल के लिए उस वातावरण में रहती हूँ पर जैसे ही ख़ुशी के सानिध्य में जाती हूँ तो उदासी पल भर में ही काफूर हो जाती है. अगर आपको भरोसा नहीं तो ... आजमा लें. इस नुस्खे के कोई पैसे नहीं लगते.
प्रकृति बिल्कुल माँ की तरह है तभी तो उसे मदर नेचर कहते हैं. उसके आँचल की छाँव में बैठ जाएँ और एक मौन वार्तालाप करें तो धीरे धीरे... आप पर से उदासी के बादल के छंटने लगेंगे. और आप अनायास ही गुनगुना उठेंगे. प्रकृति के मौन संगीत की ताल से आप भी सहजता से ताल मिलाने लग जायेंगे.

छोटी-छोटी खुशियों को आप अपने आसपास ही तलाश सकते हैं, आप चाहें तो किसी रोते हुए बच्चे की आँखों में ख़ुशी की चमक ला सकते हैं. किसी जरूरतमंद की सहायता कर उसकी जरुरत को पूरा कर सकते हैं. निस्वार्थ भाव से किया गया कोई भी काम हमारी जिंदगी में खुशियों को दोबाला कर देता है...बस करने की इच्छा का होना जरुरी है.





----------------------------------------------------वीणा सेठी ---------------

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

मेरी शब्द यात्रा ----3

वाक् -युद्ध
वाक् युद्ध याने शब्दों की लड़ाईबिना शस्त्र या अस्त्र के लड़ा जाने वाला ऐसा युद्ध जिसमें कोई भी ख़ून खराबा नहीं होता और जिसमें किसी भी तरह के युद्ध क्षेत्र की आवश्यकता नहीं होतीइस वाक् युद्ध में कोई भी आपका शत्रु या मित्र आपके सामने हो सकता है
 वाक् युद्ध में किसी भी तरह के बचाव के लिए ढाल की जरुरत नहीं होतीशब्दों द्वारा लड़ी जाने वाली इस लड़ाई में जब स्वर की प्रत्यंचा पर शब्द रूपी बाण से किसी पर वार किया जाता है तो वह ख़ाली नहीं जातावैसे भी कहा जाता है की शब्द का वार कभी ख़ाली नहीं जाता- और यह शब्द की तीव्रता पर निभर्र करता है की वह कितना गहरा घाव करता हैशव्द रूपी बाण शरीर पर घाव नहीं करता और ही यह घाव मानव काया पर दिखाई देता हैयह सीधे ह्रदय पर घाव करता है और जब इन्सान की आत्मा घायल होती है तो केवल आह निकलती हैयदि घायल इन्सान पलटवार करता है तो उससे केवल निराशा और मायूसी ही हाथ लगती है। शब्दों की इस जंग में केवल इतना ही होता कि इन्सान आपसी रिश्तों को हमेशा के लिए खो देता है. और फिर कितना भी कोशिश कर ले उसे पा नहीं सकता। 

वक् युद्ध से दिल को जो चोट लगती है उसका मरहम केवल और केवल शब्द ही होते हैंसांत्वना भरे शब्द इन्सान के दुखः को थोडा कम कर सकते हैं पर उसके निशान वक्त गुजर जाने के बाद भी कम हो जाते हैं पर रहते जरुर हैं। 
 
इसीलिए कहा जाता है कि जब भी जुबान खोलो सोच समझकर खोलोदांतों के बीच में लचीली जुबान इसीलिए कैद है क्योंकि वह जब भी लपक कर बाहर आएगी अपना असर छोड़ जाएगी.


"तुम जान ले लेते, कोई गम न  होता,
पर  तुमने जान ली मेरी, अपने लफ्ज़ों के वार से।" (वीणा )



 






मंगलवार, 21 अगस्त 2012

शब्द यात्रा .....2

वाक् -युद्ध 
वाक् -युद्ध 

वाक् युद्ध याने शब्दों की लड़ाई। बिना शस्त्र या अस्त्र के लड़ा जाने वाला ऐसा युद्ध जिसमें कोई भी ख़ून खराबा नहीं होता और जिसमें किसी भी तरह के युद्ध क्षेत्र की आवश्यकता नहीं होती। इस वाक् युद्ध में कोई भी आपका शत्रु या मित्र आपके सामने हो सकता है।वाक् युद्ध में किसी भी तरह के बचाव के लिए ढाल की जरुरत नहीं होती। शब्दों द्वारा लड़ी जाने वाली इस लड़ाई में जब स्वर की प्रत्यंचा पर शब्द रूपी बाण से किसी पर वार किया जाता है तो वह ख़ाली नहीं जाता।

 वैसे भी कहा जाता है की शब्द का वार कभी ख़ाली नहीं जाता- और यह शब्द की तीव्रता पर निभर्र करता है की वह कितना गहरा घाव करता है। शव्द रूपी बाण शरीर पर घाव नहीं करता और न ही यह घाव मानव काया पर दिखाई देता है। यह सीधे ह्रदय पर घाव करता है और जब इन्सान की आत्मा घायल होती है तो केवल आह निकलती है । यदि घायल इन्सान पलटवार करता है तो उससे केवल निराशा और मायूसी ही हाथ लगती है। शब्दों की इस जंग में केवल इतना ही होता कि इन्सान आपसी रिश्तों को हमेशा के लिए खो देता है. और फिर कितना भी कोशिश कर ले उसे पा नहीं सकता। वक् युद्ध से दिल को जो चोट लगती है उसका मरहम केवल और केवल शब्द ही होते हैं। सांत्वना भरे शब्द इन्सान के दुखः को थोडा कम कर सकते हैं पर उसके निशान वक्त गुजर जाने के बाद भी कम हो जाते हैं पर रहते जरुर हैं। इसीलिए कहा जाता है कि जब भी जुबान खोलो सोच समझकर खोलो। दांतों के बीच में लचीली जुबान इसीलिए कैद है क्योंकि वह जब भी लपक कर बाहर आएगी अपना असर छोड़ जाएगी.

रिश्तों पर  वाक्-युद्ध धारदार हथियार का काम करता है, रिश्ते  जब  खून के हों तो बातचीत के लिए किसी औपचारिकता की आवश्यकता  नहीं  पड़ती ,पर ........पर ऐसा क्यों  होता है ....???कि जिन्हें हम दुनिया में सबसे अधिक  चाहते हैं , उन्हें  ही  हम प्रायः अपनी पैनी जुबान  याने वाक् -युद्ध से  जाने -अनजाने घायल कर देते हैं और बाद में पछताते  भी हैं।  ऐसा शायद इसलिए भी  होता  है  क्योंकि  हम ये भूल  जाते हैं कि ये रिश्ते  हमारे  लिए दुनिया में सबसे अधिक  कीमती  और मायने रखते हैं पर....पर हम करते इसके ठीक विपरीत हैं। किसी ने सच ही कहा है कि .....घर की मुर्गी दाल बराबर ....... और यही सोच हमारे व्यवहार में भी दिखाई देने लगती है। और रिश्तों  का हश्र  वाक्-युद्ध  की शक्ल  में  बाहर  आता है  और तीर तो कमान से निकल ही  चुका  होता है जिसे लौटाया हरगिज  भी नहीं जा सकता , ये केवल और ..केवल अहम् के टकराव के कारण  होता है।

कैसे  रोके इस वाक्-युद्ध को...........

 इस तरह होने वाली शब्दों की लड़ाई को रोकना हमारे ही हाथ में है, केवल करना इतना है जब भी आत्मीय वातावरण  में अपनों के बीच  बातचीत चल रही हो तो छोटीछोटी बातों को अहम् का मुद्दा  बनाने से बचें। दूसरी  स्थिति  में यदि बात का रुख लड़ाई के मैदान में तब्दील होता नजर आने लगे तो बात को एक खबसूरत  मोड़  देकर ख़त्म  कर देना चाहिए।

वीणा सेठी 







रविवार, 12 अगस्त 2012

मेरी शब्द यात्रा .....2

वाक् -युद्ध 


वाक् -युद्ध



वाक् युद्ध याने शब्दों की लड़ाई। बिना शस्त्र या अस्त्र के लड़ा जाने वाला ऐसा युद्ध जिसमें कोई भी ख़ून खराबा नहीं होता और जिसमें किसी भी तरह के युद्ध क्षेत्र की आवश्यकता नहीं होती। इस वाक् युद्ध में कोई भी आपका शत्रु या मित्र आपके सामने हो सकता है।वाक् युद्ध में किसी भी तरह के बचाव के लिए ढाल की जरुरत नहीं होती। शब्दों द्वारा लड़ी जाने वाली इस लड़ाई में जब स्वर की प्रत्यंचा पर शब्द रूपी बाण से किसी पर वार किया जाता है तो वह ख़ाली नहीं जाता।

 वैसे भी कहा जाता है की शब्द का वार कभी ख़ाली नहीं जाता- और यह शब्द की तीव्रता पर निभर्र करता है की वह कितना गहरा घाव करता है। शव्द रूपी बाण शरीर पर घाव नहीं करता और न ही यह घाव मानव काया पर दिखाई देता है। यह सीधे ह्रदय पर घाव करता है और जब इन्सान की आत्मा घायल होती है तो केवल आह निकलती है । यदि घायल इन्सान पलटवार करता है तो उससे केवल निराशा और मायूसी ही हाथ लगती है। शब्दों की इस जंग में केवल इतना ही होता कि इन्सान आपसी रिश्तों को हमेशा के लिए खो देता है. और फिर कितना भी कोशिश कर ले उसे पा नहीं सकता। वक् युद्ध से दिल को जो चोट लगती है उसका मरहम केवल और केवल शब्द ही होते हैं। सांत्वना भरे शब्द इन्सान के दुखः को थोडा कम कर सकते हैं पर उसके निशान वक्त गुजर जाने के बाद भी कम हो जाते हैं पर रहते जरुर हैं। इसीलिए कहा जाता है कि जब भी जुबान खोलो सोच समझकर खोलो। दांतों के बीच में लचीली जुबान इसीलिए कैद है क्योंकि वह जब भी लपक कर बाहर आएगी अपना असर छोड़ जाएगी.
रिश्तों पर  वाक्-युद्ध धारदार हथियार का काम करता है, रिश्ते  जब  खून के हों तो बातचीत के लिए किसी औपचारिकता की आवश्यकता  नहीं  पड़ती ,पर ........पर ऐसा क्यों  होता है ....???कि जिन्हें हम दुनिया में सबसे अधिक  चाहते हैं , उन्हें  ही  हम प्रायः अपनी पैनी जुबान  याने वाक् -युद्ध से  जाने -अनजाने घायल कर देते हैं और बाद में पछताते  भी हैं।  ऐसा शायद इसलिए भी  होता  है  क्योंकि  हम ये भूल  जाते हैं कि ये रिश्ते  हमारे  लिए दुनिया में सबसे अधिक  कीमती  और मायने रखते हैं पर....पर हम करते इसके ठीक विपरीत हैं। किसी ने सच ही कहा है कि .....घर की मुर्गी दाल बराबर ....... और यही सोच हमारे व्यवहार में भी दिखाई देने लगती है। और रिश्तों  का हश्र  वाक्-युद्ध  की शक्ल  में  बाहर  आता है  और तीर तो कमान से निकल ही  चुका  होता है जिसे लौटाया हरगिज  भी नहीं जा सकता , ये केवल और ..केवल अहम् के टकराव के कारण  होता है।
कैसे  रोके इस वाक्-युद्ध को...........

 इस तरह होने वाली शब्दों की लड़ाई को रोकना हमारे ही हाथ में है, केवल करना इतना है जब भी आत्मीय वातावरण  में अपनों के बीच  बातचीत चल रही हो तो छोटीछोटी बातों को अहम् का मुद्दा  बनाने से बचें। दूसरी  स्थिति  में यदि बात का रुख लड़ाई के मैदान में तब्दील होता नजर आने लगे तो बात को एक खबसूरत  मोड़  देकर ख़त्म  कर देना चाहिए।

वीणा सेठी 






















  

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