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गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

Earth Is Calling



 धरती पुकारती है

Earth
“Earth is calling” याने धरती पुकारती है. हम धरती को माँ कहते हैं. ऋग्वेद में एक श्लोक है, जिसका तात्पर्य है कि हे माँ मुझे क्षमा करना मै तेरे वक्ष पर अपने पैर रख रहा हूँ... यही कारण है कि हमारे ऋषि-मुनि जो जंगलों में रहते थे वे लकड़ी के खडाऊं पहनते थे.
Lush Greenery
हमारी धरती दूर से एक बेहद सुंदर आसमानी नील और हरे रंग की दिखती, शायद इस ब्रहमाण्ड में ऐसा अकेला और सुन्दर ग्रह कोई दूसरा नहीं है. एक समय था जब धरती का भू भाग पूरी तरह से हरियाली से आच्छादित था... पर इन्सान नामक प्राणी ने उसकी इस हरी चुनर को तार-तार करना शुरु कर दिया. ये भी कोई बताने की बात नहीं है, पर ...इसका जिक्र एक बार अवश्य करना चाहूँगी. इन्सान की हवस और पैसे की चाहत ने धरती का सीना रौंद डाला. वह एक माँ की तरह अपनी संतानों को निस्वार्थ भाव से देती ही आई है और बदले में उसे हमने क्या दिया ये बताने की कोई जरुरत नहीं है...? पर हम कहाँ शर्मिंदा हैं अपने इस कृत्य से.
Forest

आज हमारी धरती खतरे में है, ये हम सब जानते हैं. ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट (Green House Effect) के कारण  धरती का रक्षा कवच याने ओजोन लेयर (Ozone Layer) छलनी हो रहा है और उसके खतरे से हम अन्जान नहीं हैं. वातावरण इतना प्रदूषित हो चुका है कि साँस लेना आसान नहीं रहा. जो चीजे हम रोजाना इस्तेमाल करते हैं उनसे हम कितना प्रदूषण फैलातें हैं, ये हम से नहीं छिपा है और इस सच से आँख चुराना हमारे लिए घातक हो सकता है. अगर हम अपने रोज के जीवन में कुछ बातों का ध्यान रखें तो हम वास्तव में वातावरण को प्रदूषित होने से बचा सकते हैं.
1 पोलीथिन के स्थान पर कपडे या कागज के थैले का इस्तेमाल करें. Sa
2 अगर एक रूट पर जा रहे हों तो एक ही गाड़ी से जाएँ, पेट्रोल और पैसे की बचत तो होगी ही साथ में रिश्ते भी मजबूत होंगे. धरती के साथ आपकी दोस्ती प्रदुषण कम करके ही हो सकती है.
3 आजकल जिस तरह से डिस्पोजेबल चीजों का इस्तेमाल हो रहा है उससे कचरा तो बढ़ ही रहा है साथ में प्रदुषण भी. डिस्पोजेबल चीजों के इस्तेमाल को ना कहना सीखें.
4 अपने घर में हरियाली जरुर लायें, याने पेड़-पौधे लगायें. इससे घर में पॉजिटिव एनर्जी भी बनी रहती है. और मूड तो बेहद शानदार हो जाता है.
5 सरकारी खाली पड़ी जमीं पर हरे वृक्ष लगायें और उनकी देखभाल करना न भूलें. ये वृक्ष अगली पीढ़ी को आपकी सौगात होगी.
6 naturaप्राकृतिक जंगलों को बचाना सबसे जरुरी काम है. क्योंकि ये जंगल रहेंगे तो धरती पर जीवन रहेगा.
7 पानी की बचत करना सीखें. पानी को व्यर्थ ही न बहायें. क्योंकि जल ही पृथ्वी पर जीवन है.
अब सब मै बताउंगी तो आप शायद सोचना न चाहें ... इसलिए कुछ आपके सोचने के लिए छोड़ देती हूँ. एक कदम मैंने बढाया है अब एक आप बढ़ाएं..
सुनिए धरती आपको पुकारती है ...
Really Earth is Calling. Now it our duty to save the Mother Earth .
उसे माँ कहते हो,
फिर भी उसका सीना क्यों रौंदते हो...?
नहीं छल करना अपनी माँ से;
वह ये सह न पायेगी.
सम्हाल जाओ ;
अभी भी वक्त है.
नहीं तो वह तुम्हे,
स्वयं ही सजा दे देगी.  (वीणा)


बुधवार, 25 मार्च 2015

ख़ुशी के पल



दिल ढूंढता है ख़ुशी के पल...

इन्सान का वजूद इस धरती पर और जीवित प्राणियों से कई मायनों में फर्क है और एक बात और भी है जो उसे दूसरों से अलग करती है और ये हम सब जानते हैं. इंसानी दिमाग का कोई मुकाबला हो ही नहीं सकता. इसी दिमाग के बल पर वह दुनिया पर राज कर रहा है, ये दिमाग भी इंसानी शरीर के एक भाग के आगे बेबस हो जाता है. ये इंसानी दिल है जो दिमाग को हरा देता है.
इन्सान के अन्दर उठने वाले अलग-अलग भावनाएँ इसी दिल में पैदा होती हैं, हिलोर लेती हैं और यहीं ख़त्म भी हो जाती हैं. अब इस दिल में अगर ख़ुशी जागती है तो गम भी यहीं पनाह लेता है. इसी तरह के आवेगों और संवगों को दिल सम्हाले रखता है.
ये सच है कि इन्सान जिंदगी भर ख़ुशी और गम के पलों में ही जिंदगी की सांसों का हिसाब खोजता  रहता है. ख़ुशी के पल में वो हँसता और मुस्कराता है और दुख के पलों में उसे जीवन बोझिल लगने लगता है और ऐसा लगता है मानो वक्त थम सा गया है और शायद यही ठहरा रहेगा. ख़ुशी के पल तो मानों पंख लगा कर उड़ जाते हैं. बिल्कुल चार दिन की चांदनी की तरह. अब जिंदगी के इस गणित में, वैसे देखा जाये तो शायद ... ख़ुशी का पलड़ा हल्का ही लगेगा. पर ... ये सब दिल से महसूस करने की बात है. पर... ये दिल है कि मानता नहीं. और चल पड़ता है ख़ुशी के पलों की तलाश में. अब जब Coca-Cola International Day of Happiness ने ख़ुशी के
 पलों की तलाश का तरीका पूछा है तो ... बताना तो पड़ेगा ही! 

Happniess-Image from google.com

अगर जिंदगी को सहजता और सरलता से जीना है तो खुशियों के लिए कहीं जाना नहीं पड़ेगा और खुशियाँ ढूंढने कहीं जाना भी नहीं पड़ेगा.
मेरा ख़ुशी ढूंढने का तरीका बेहद आसान है, शायद आपको भी भा जाये. खुशियाँ छोटी-छोटी बातों में खोजना बेहद सरल है. और इसमें कोई जोखिम नहीं और कोई खर्चा नहीं होता, ये फ्री में मिल जाती है बस थोड़ा सोचना पड़ता है. मै जब भी उदास होती हूँ या कुछ अन्यमनस्क सी होती हूँ तो कुछ देर के लिए... कुछ पल के लिए उस वातावरण में रहती हूँ पर जैसे ही ख़ुशी के सानिध्य में जाती हूँ तो उदासी पल भर में ही काफूर हो जाती है. अगर आपको भरोसा नहीं तो ... आजमा लें. इस नुस्खे के कोई पैसे नहीं लगते.
प्रकृति बिल्कुल माँ की तरह है तभी तो उसे मदर नेचर कहते हैं. उसके आँचल की छाँव में बैठ जाएँ और एक मौन वार्तालाप करें तो धीरे धीरे... आप पर से उदासी के बादल के छंटने लगेंगे. और आप अनायास ही गुनगुना उठेंगे. प्रकृति के मौन संगीत की ताल से आप भी सहजता से ताल मिलाने लग जायेंगे.

छोटी-छोटी खुशियों को आप अपने आसपास ही तलाश सकते हैं, आप चाहें तो किसी रोते हुए बच्चे की आँखों में ख़ुशी की चमक ला सकते हैं. किसी जरूरतमंद की सहायता कर उसकी जरुरत को पूरा कर सकते हैं. निस्वार्थ भाव से किया गया कोई भी काम हमारी जिंदगी में खुशियों को दोबाला कर देता है...बस करने की इच्छा का होना जरुरी है.





----------------------------------------------------वीणा सेठी ---------------

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

हाइकु:गणेश उत्सव


 हाइकु:गणेश उत्सव  
 गणेश स्तुति




हे विघ्नहर्ता!
धरती पर आओ;
संकट हरो.


हे गजानन!
हो शुभारंभकर्ता
हर कार्य के.


लम्बोदराय
मूषक है वाहन
ऐसे गणेश.


.विद्या के दाता;
रिद्धि-सिद्धि वर दे;
गौरी सुताय.
                                                                                   वीणा सेठी

रविवार, 9 मई 2010

.बात एक अनकही सी..3.

मदर्स  डे पर एक बात.............

एक दिन माँ के नाम..............पर...........

मई को पूरी दुनिया में 'मदर्स' डे के रूप में बड़े जोरों शोरों से मनाया जा रहा है पर हमारे यहाँ तो माँ के लिए तो पूरे ३६५ दिन होते हैं उसके लिए किसी विशेष दिन की आवश्यकता ही नहीं कोंकी माँ है ही इतनी आदरणीय और प्यारी की हर दिन उसके नाम पर है
हमें किसी भी रिश्ते को यदि याद करने या निभाने की तब जरुरत होती है जब हम उसे भूलने लगते हैं और उस के नाम एक विशेष दिन करके उस रिश्ते को एक विशेष एहसास दिलाने की कोशिश करते हैं ऐसा तभी जरुरी होता है जब हमारे पास उस रिश्ते को निभाने का समय नहीं होता या हम अपनी ही दुनिया को ' its my life' कारके जीना चाहते हैं और दूसरे रिश्ते और एहसास के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने की के लिए समय की कमी का बहाना बना देते हैं फिर ग्लानी स्वरुप इस रिश्ते को एक नाम विशेष देने की चेष्टा करते हैं और जाने किस-किस तरह के स्वांगों से उस रिश्ते के प्रति अपना एक बड़ा सा धन्यवाद कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं और उक्त दिन को साल के बाकि दिनों के लिए उस एहसास और रिश्ते को किसी स्टोर रोम के किसी अँधेरे कोने किसी अलमारी या बक्से में बंद कर अपनी दुनिया में 'its my life' को जीने के लिए लौट जाते हैं
वास्तव में मदर्स डे पश्चिम की देन है और ये विचारधारा इस लिए वहां पनपी क्योंकि वहां रिश्तों को निभाने के लिए समय की सीमा निर्धारित है और लहू के रिश्तों में भी मिलने के लिए पहले से समय निर्धारित किया जाता है उसी के बाद ही माता-पिता अपनी संतानों से या संतान अपने माँ-पिता से मिल पते हैं पिश्चिम संस्कृति में रिश्तों को निभाने में भी औपचरिकताओं की मोहताज है और यही सोच भारत में भी अपने पैर पसर रही है और इसके लिया बाकायदा मीडिया का सहारा लिया जा रहा है और इस दिन को प्रायोजित भी किया जा रहा है, इस तरह की सच किसी दिन वक्त की धारा के बिच छोटे-छोटे टापू की तरह निकल आयेंगे
भारत में " माँ" एक अहम् शब्द है जो किसी दिन का मोहताज नहीं , यहं माँ का दर्जा इश्वर से भी ऊँचा है यही एक रिश्ता पूरी दुनिया में ऐसा है जो किसी भी स्वार्थ से ऊपर और बिना किसी मांग या पहचान के जीने की छह रखता है भारत में माँ अपनी संतानों से ममत्वपूर्ण प्रेम करती है और उसकी ममता की स्नेह की धारा अविरल बहती है इसलिए भारत में तो पूरे ३६५ दिन माँ के नाम है

एक बात अभी शेष है.......................

mothers day पर इस माँ को नहीं भूलना चाहिए जिसे ' धरती माँ' कहते हैं.जिसके आँचल में पूरा प्राणी जगत साँस ले रहा है हम अपनी इस जगत माँ से ही उसकी सांसे छिनने की कोशिश कर रहे हैं जिस तरह से हम उसकी संताने होकर उसका सीना लहूलुहान कर रहे हैं कही ऐसा हो की एक दिन हमारा ही अस्तित्व संकट में जाये ??????????



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