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बुधवार, 17 अप्रैल 2013

मेरी शब्द यात्रा

भय

'भय' मन का एक आवेग है. यह मानव को कमजोर करता है. भय या दर एक नकारात्मक आवेग है. ये दिल में उत्पन्न होकर मस्तिष्क तक फ़ैल जाता है और हृदय में आशंका को जन्म देता है.





आजकल एक पेय पदार्थ के उत्पाद के विज्ञापन में एक वाक्य लगभग जुबान पर चढ़ जाने वाला है, " दर के आगे जीत है ", वाक्य विन्यास कुछ गलत अवश्य है किन्तु एक सन्देश देता है. भावार्थ में यही है कि डर का सामना करने के बाद डर गायब हो जाता है और यही डर पर जीत का डंका बज जाता है.

डर भी दो तरह के होते हैं. एक वास्तविक और दूसरा काल्पनिक या आभासी, और दोनों का सम्बन्ध हमारी मानसिक अवस्था से होता है. वास्तविक डर वो होता है जिसका हमें पता होता है कि वो कहाँ पर है या उसका कहाँ पर सामना करना पड़ेगा.काल्पनिक या आभासी डर वो है जो अज्ञात है किन्तु ये भय वो है जो आशंकाजनित होता है, ये प्रायः आधारहीन होता है या फिर कभी-कभार इस का आधार हो भी सकता है.किन्तु अज्ञात के प्रति उत्पन्न भय या दर किसी होनी की आशंका से उपजा होता है और इसकी पकड़ अवचेतन मन के साथ मनुष्य की चेतना पर भी होती है. आशंका से उपजा दर हमारी विचार शैली के साथ-साथ कार्य-शैली को भी प्रभावित करता है और हमारे कार्य की परिणाम पर भी प्रभाव डालता है.

किसी कार्य के प्रारंभ में ही उसके परिणाम के विषय में हमारी नकारात्मक सोच उस कार्य की सफलता के प्रति आशंका को जन्म देती है और इससे जो भय हमारे हृदय में उत्पन्न होता है वह हमारी मानसिक चेतना को भी जकड़ लेता है और यही हमारी कार्य क्षमता को भी प्रभावित करता है जिसके कारण हमारा जो उत्साह और जोश काम करने की चाहत को लेकर होता है वह कम हो जाता है. और कार्य को आधे-अधूरे व आशंकित मानसिक स्थिति से करने पर, कार्य की असफलता का जो डर हमारे मन में उपजा होता है वह हकीकत बन कर हमरे सामने खड़ा हो जाता है.अतः नकारात्मक विचार  व भाव हमेशा काल्पनिक डर का मूल हुआ करते हैं.सो आवश्यकता है एक सकारात्मक सोच या विचार शैली की जो हमारी सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है और हमारे मन में उपजे डर पर विजय दिलवाता है.

बहुत अधिक भावुकता या संवेदनशीलता भी रिश्ते-नातों के लिए एक अव्यक्त से डर की उत्पति का कारण बनती है. किसी अपने के लिए आधारहीन  काल्पनिक भय अति रागात्मकता का परिणाम होती है. किसी अपने को खो देने का डर इस हद तक बढ़ जाता है की इन्सान की भूख प्यास भी छीन लेता है, ऐसी सोच इन्सान की सोचने की ताकत पर बहुत ही नकारात्मक प्रभाव डालता है. ऐसा व्यक्ति तनावग्रस्त जीवन जीता है और भयग्रस्त जो जाता है और अपने आसपास के लोगों के लिए भी मानसिक त्रास का कारण बन जाता है. हमारे कृत्यों का परिणाम यदि किसी भय को पैदा करता है तो वह वास्तविक ही होता है. कुछ भी हो डर या भय को स्वयं पर हावी न होने दें बल्कि उसका सामना पुरे जोश व निडरता से करें फिर देखिये डर स्वयं ही भाग जायेगा.


बुधवार, 25 अप्रैल 2012

.यादें -------5(डर पर काबू)

डर पर काबू पाना सीखो...

 पिछली मार्च की १-२ तारीख में मै स्कूटी से होशंगाबाद जा रही थी. गाड़ी में काफी सावधानी से चलती हूँ और हमेशा राईट साइड का ध्यान रखती. मेरी कोशिश यही रहती है की मई ५० की गति से अधिक नहीं चलाऊँ. उस दिन भी मै इतनी ही स्पीड से स्कूटी चला रही थी. होशंगाबाद से कोई २-३ km दूर पहाड़िया पिकनिक स्पोट है( ये जगह काफी मशहूर है. यहाँ पर प्रागैतिहासिक कालीन गुफाएं हैं और टूरिस्ट बहुत आते हैं.. मार्च के महीने में मसुं में थोड़ी सी गर्मी घुलने लगी थी और दोपहर के समय इस इलाके में थोड़ी सी ख़ामोशी का आलम छाने लगता है.  पहाड़िया के सामने से सड़क गुजरती है और थोड़ी आगे ही एक गहरा मोड़ आता है वही पर अचानक सामने से एक जीप आ गई और मै अपना संतुलन नहीं रख सकी और जीप ने मेरी गाड़ी को जमकर टक्कर दी और मै गाड़ी सहित घसीटती हुई सड़क के किनारे गढ्ढे में जा पड़ी. ये तो गनीमत थी कि गढ्ढा गहरा नहीं था. जीप वाला मुझे घायल कर भाग गया.मुझे काफी चोटें आई थीं। मै काफी देर तक घायल अवस्था में सड़क के किनारे पड़ी रही पर कोई भी मेरी सहायता को नहीं आया, और स्कूटी के नीचे में दबी सी पड़ी थी काफी देर बाद हिम्मत करके मै खड़ी हुई। हिम्मत करके गाड़ी सीधी की और उस समय तो चोटों का दर्द महसूस नही हुआ पर जैसे-तैसे ५० की.मी तक गाड़ी चलाकर मै घर तक पहुचीं और ३-४ घंटे बाद जब दर्द को महसूस किया तो पसलियों पर पड़ी चोटें पुरे दो महीने बाद जाकर ठीक हुई।


घर में सब चिंता कर रहे थे और माँ से जब डांट पड़ी तो और हिदायत मिली कि आगे से कभी अकेले गाड़ी चलकर दूर नहीं जाओगी. इस घटना का जो मुझ पर जो असर हुआ उसके कारण मै लगभग ८-१० महीने गाड़ी चलाने से कतराती रही और फिर एक दिन जनवरी के महीने में पुनः होशंगाबाद जाने का अवसर आया तो मै बहाने बनाने लगी और सोचा की क्यों न बस से जाऊं । तब मेरे पापा ने कहा , " नहीं! तुम स्कूटी से ही जाओ । अगर आज नहीं गई तो जिदगी भर स्कूटी क्या कोई भी गाड़ी नहीं चला पाओगी । अपने डर पर काबू पाना सीखो ,अगर आज डर से हार गई तो फिर कभी भी जिंदगी में कोई काम करने का जोखिम नहीं उठा पाओगी और कुछ करने से पहले ही हार का सामना करना पड़ेगा क्योंकि............ जब भी तुम कुछ नया काम करना शुरू करोगी तो तुम्हे ये घटना याद आएगी और तुम काम आधे-अधूरे मन से करोगी और हमेशा यही डर सताएगा कही इससे कुछ हानि तो नहीं हो जाएगी.......... अपने डर को अपने पर हावी मत होने दो, उसका सामना करो वो अपने आप भाग जायेगा......."
बस अपने पापा कि बात गांठ बांध ली और फिर से स्कूटी से होशंगाबाद गई और मेरा सफ़र यही नहीं रुका आज मै गारमेंट कंपनी को सफलता पूर्वक चला रही हूँ. ये डर से सामना करने का नतीजा था कि मै अब कोई  भी जोखिम लेने से नहीं चूकती



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