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गुरुवार, 13 अगस्त 2015

कविता -गर



गीतिका -अगर
 
इमेज-साभार गूगल.कॉम


जिंदगी बन गई तपती दोपहर,
छाँव नहीं अब किसी भी पहर.

छू लेने को आसमान तैयार हैं;
हौंसलों को बस लगने हैं पर.

गर कोई चराग नहीं है जला;
हम तो जला सकते हैं मगर.

किसी की आँख में गर हैं आंसू;
क्यों न पोंछा जाये उन्हें अगर;

ये शाम वैसी नहीं रहेगी अब;
सेहन में जलता दिया रखें गर.


वीणा सेठी.

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

कविता

धूप :कविता 





जिधर देखो आज
धुन्धलाइ सी है धूप. 

न जाने आज क्यों?
कुम्हलाई सी है धूप. 

आसमाँ के बादलों से
भरमाई सी है धूप. 

पखेरूओं की चहचाहट से
क्यों बौराई सी है धूप? 

पेड़ों की छाँव तले
क्यों अलसाई सी है धूप? 

चैत के माह में भी
बेहद तमतामाई सी है धूप. 

हवाओं की कश्ती पर सवार
क्यों आज लरज़ाई सी है धूप? 








वीणा सेठी.

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