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गुरुवार, 14 मई 2015

बात एक अनकही सी

'सु' और 'कु' शब्दों की माया..

शब्द केवल निर्जीव याने संज्ञाहीन ध्वनि या कोरे कागज लिखी हुई स्याही नहीं वरन आवाज के साथ आकार लेते हुए कुछ आकृतियाँ है और कोरे कागज पर आकार लेती हुई कुछ लकीरें होती हैं, जो जब तक बोली न जाएँ महत्वहीन रहती हैं। जब भी शब्दीन को ध्वनि मिली है उसने अपना प्रभाव दिखाया है। शब्द अपना अर्थ रखते हैं और इसी का उपयोग हम अपने रोज के जीवन में करते हैं .
शब्द के आगे केवल एक शब्द लग जाने से ही वह अच्छे या बुरे भाव की श्रेणी में ड़ाल दिया जाता है।
केवल 'सु' या 'कु' लगाने से ही शब्द के मायने पूर्णतया बदल जाता है 'सु' याने अच्छा और 'कु' याने बुरा....................
पूत............... याने बेटा और जब इसके आगे .'सु' लग जाये तो वह 'सपूत' मतलब अच्छा देता और 'कु' लग जाये तो 'कपूत' याने बुरा बेटा......................
हिंदी के शब्दकोष में ढूंढेंगे तो बहुत सरे इस तरह के शब्द मिलेंगे

बुधवार, 9 मई 2012

हिंदी हाइकू ................1

(1)

नींद 

पलकों पर  गिरी;
फिर 
 बह चली ......
 दरिया की मनिंद .


(2)

खत 

कोरे कागज पर,
स्याही से उकेरे ;
कुछ  शब्द .

(3)

खता 

एक पल  की खता :
और  
सदियों  को  मिली  सजा. 

(4)

आसूं 

सुख  में :
दुख में;
पलक  की  कोर पर 
ठहरी  सी:
खारे  पानी की एक बूंद .
  (5)


ऑस 

शीत   की भोर में ;
पत्तों पर ठहरा हुआ ,
पानी का एक कतरा.

(6)
वृक्ष 

 एक तना;
कुछ  शाखाएँ ;
ढेरों पत्तों का लबादा ओढ़े;
स्थिर खड़ा
 आमंत्रण देता. 









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